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बदलती दुनिया में भारत की दुविधा

वे आईं, उन्होंने देखा पर वे किसी को जीत नहीं पाईं। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा का यही सार है। हर तरह के सही स्वर उठे पर नतीजा ठोस नहीं रहा। भारत ने ऐसी दो जगहों की घोषणा की, जहां अमेरिकी कंपनियों को एटमी प्लांट लगाने का विशिष्ट अधिकार होगा। अंतरिक्ष सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक ऐसा समझोता किया गया, जिसके तहत भारतीय प्रक्षेपण यान के माध्यम से अमेरिकी उपग्रह या अमेरिकी उपकरणों से बने भारतीय उपग्रह छोड़े जाएंगे। अमेरिका और भारत ने प्रयोग संपुष्टि समझोता (एंड यूजर वेरिफिकेशन एग्रीमेंट) भी किया जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां भारत को आधुनिक हथियार बेंचेंगी। लॉकहीड मार्टिन और बोइंग जैसी कंपनियां दुनिया के सबसे बड़े हथियार सौदे के लिए बोलियां लगाने को आतुर हैं और भारत 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी में है। आखिरकार दोतरफा संबंधों को और मजबूती प्रदान करने के लिए रणनीतिक संवाद (स्ट्रेटजिक डॉयलाग) नाम से एक मंच भी गठित किया गया। भारत के प्रति ओबामा प्रशासन के रवए पर अविश्वास के स्तर को नजरंदाज करते हुए पिछले कुछ महीनों से सार्वजनिक घोषणाएं चलती ज रही हैं।भारतीय रणनीतिकारों के विशिष्ट वर्ग का मानना है कि बुश प्रशासन के बाद होने वाला परिवर्तन कोई ज्यादा कठोर नहीं होगा।

बराक ओबामा ने जब से अमेरिकी राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया है, तब से भारतीय विदेश नीति प्रतिष्ठान रक्षात्मक हो चला है। जहां बराक ओबामा ने बुश प्रशासन की तरफ से भारत के लिए की गई ज्यादातर पहल को एक-एक कर या तो उपेक्षित किया या दरकिनार किया, वहीं भारत ने अपनी छवि एक ऐसे धैर्यवान देश के रूप में प्रस्तुत की है जिसे उम्मीद है कि एक दिन नया अमेरिकी प्रशासन महसूस करेगा कि दक्षिण एशिया में शीतयुद्ध युग की नीतियों पर वापस लौटने से कोई लाभ नहीं होगा।इसके बावजूद ओबामा प्रशासन के पास अल्पकाल के लिए ही सही, लेकिन अपनी भारतीय नीति को सही करने का न तो समय मिल पाया, न ही उन्होंने ऐसा कोई रुझान दिखाया।

हालांकि इस समय अमेरिकी विदेशी नीति को व्यापक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उनके पास संदर्भों का ऐसाव्यापक फ्रेम नहीं है, जिससे ओबामा प्रशासन अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर निगाह डाल रहा हो। इसकी कुछ वजह यह है कि वहडरावने घरेलू कार्यक्रम में बुरी तरह से उलझ हुआ है और कुछ वजह यह है कि ओबामा की विदेश मामलों में ज्यादा रुचि नहीं है। एक तरह से दुनिया का सबसे ताकतवर खिलाड़ी विश्व के खेल मैदान में किनारे बैठ कर संतुष्ट है। भूराजनीतिक दृष्टि और सुसंगति के अभाव में आज अमेरिका अपने को चारों तरफ से घिरा हुआ पा रहा है। उत्तर कोरिया ने संयुक्त राष्ट्र का खुलाउल्लंघन और अमेरिका पर निशाना साधते हुए अमेरिकी चेतावनी को गीदड़ भभकी साबित कर दिया। जवाब में अमेरिका महज कुछ धमकियां दे सका, जिसके बारे में उसके दोस्तों का भी मानना है कि उसमें उसे लागू करने की क्षमता नहीं है।


इस बीच ओबामा की ईरान नीति तार-तार हो चुकी है। ईरान में हाल में हुए उथल-पुथल से अमेरिका की बहुप्रचारित संवाद नीति को गहरा धक्का लगा है। ओबामा पहले तो ईरान सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आदर करने की सलाह देने तक सीमित रहे, बाद में वे कड़ी प्रतिक्रिया जताने पर मजबूर हुए। लेकिन एक बात अब साफ हो चुकी है कि ओबामा ईरान से अब वार्ता स्थापित करने के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं होंगे, क्योंकि वहां की सरकार धांधली के बाद चुनी गई साबित हो सकती है। अब या तो ईरान में 30 साल पुराने इस्लामिक शासन के खिलाफ लगातार देशव्यापी आंदोलनचले और इस शासन को झकझोर दे। पर इसकी संभावना इसलिए नहीं दिखती, क्योंकि सेना और मुल्लाओं के पास हथियार हैं। ऐसी स्थिति में ओबामा अगर ईरान से बात करेंगे भी तो वे एक ऐसे शासन से बात करेंगे, जिसे मुसलमानों के लिए दिए गए अपने मशहूर काहिरा भाषण में उन्होंने ‘निराधार’ ‘अज्ञानी’ और ‘ईर्ष्यापूर्ण’ कहा था। जिन्होंने भी तेहरान से बातचीत का विरोध किया था, अब वे प्रोत्साहित हुए हैं और कह रहे हैं कि तेहरान की सत्ता को दमनकारी समझने वाला उनका तर्क सही था।
अपनी ईरान नीति को लेकर अमेरिका फिर भटकाव का शिकार हो गया है। अब उसे सिर्फ ईरान के मौजूदा संकट से उम्मीद है। लेकिन एशिया और प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के सामने जो चुनौतियां हैं उसके सामने यह समस्याएं कुछ नहीं हैं। इस इलाके में चीन के उभार से सत्ता के सारे पारंपरिक संतुलन बिगड़ गए हैं। शुरू में अमेरिका के नए प्रशासन ने जी-2 के विचार को चलाने की सोची। इसका अर्थ यह था दुनिया पर अमेरिका और चीन का सहराज्य कायम हो, जिसके तहत चीन से एशिया और प्रशांत क्षेत्र को संभालने की उम्मीद की जा सकती है। इस विचार ने अमेरिकी सहयोगियों को नींद से जगा दिया है। जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया ने यह महसूस करते हुए कि इस इलाके में उनकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं की अमेरिका उपेक्षा कर रहा है, उसे चेतावनी दी कि इससे एशिया और प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका रणनीतिक रूप से दरकिनार हो जाएगा।

अमेरिका ने अपनी इस गलती को शीघ्र ही महसूस किया और हाल में इसमें संशोधन का प्रयास किया। अब जी-3 फोरम की बात चल रही है, जिसके तहत इस महीने के अंत तक- अमेरिका, चीन व जपान- तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक मंच पर आएंगी। यह विचार महज जापान को शांत करने के लिए है, जो जी-2 से खुद को दरकिनार महसूस कर रहा था। लेकिन भारत के लिए यह सारी हलचलें नई तरह की चुनौती प्रस्तुत करती हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि ओबामा प्रशासन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का जो नया रणनीतिक खाका बना रहा है उसमें, चीन की प्रमुख भूमिका होने ज रही है। अमेरिका जिस तरह चीन पर निर्भर है, उससे अमेरिकी प्रशासन की यह प्राथमिकताएं उचित ही लगती हैं। इस दौरान रणनीतिक योजना में भारत हाशिए पर फेंका जा रहा है। पहले अमेरिका भारत को एक बढ़ती हुई ताकत और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक संतुलन कायम करने वाली शक्ति मान रहा था, लेकिन अब वह इसे एक ऐसी क्षेत्रीय शक्ति के रूप में देख रहा है, जिसकी कुल भूमिका इतनी है कि पाकिस्तान तालिबान से पूरी ताकत से लड़ता रहे और कश्मीर मसले पर उसका विचलन न हो। हालांकि आज अमेरिका चीन और रूस से सघन रणनीतिक संवाद में लगा हुआ है, पर ऐसी स्थिति में भी भारत अमेरिका की उपेक्षा नहीं कर सकता। दूसरी तरफ भारत को इस इलाके में बिगड़ते शक्ति संतुलन को अपनी ओर करने के तरीके ढूंढ़ने ही होंगे।
 
harsh.pant@kcl.ac.uk
लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं

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