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लोकमानस में शिव

विद्यापति ने मैथिली भाषा में शिव के विभिन्न रूपों को जो जीवंतता प्रदान की, वह आज भी बेमिसाल है। शिव के औघड़दानी रूप को चित्रित करती उनकी पंक्तियां हैं-
‘जोगिया हमर जगत सुखदायक दुख ककरों नहीं देत
सोने रूपे छाड़ती अनका पुत लय, अपना ला जंजाल
कार्तिक गणपति दुहु जन बालक, जग भर के प्राण
तिनका नहीं कुटु अभरण थिकइन, रति भर सोना नहीं कान।’
लोकमानस में शिव का चरित्र अपरिग्रही के रूप में भी छाया हुआ है। एक मैथिली लोकगीत में पार्वती शिव को बार-बार गृहस्थ हो कर एक नियत स्थानवासी बनाने का प्रयत्न करती है। लोक गीतकार की कल्पनानुसार पार्वती के दुराग्रह को शिव टाल नहीं पाते और अपनी सवारी बसहा बैल को सर्प की रस्सी से बांध कर खेत जोतकर बीज डालते हैं। परंतु खेत की मेढ़ पर पहुच कर उनकी सारी प्रसन्नता दीनता में बदल जाती है। अगल-बगल के खेतों में धान और गेहू लहलहा रहे हैं और पार्वती के खेत में भांग के पौधे हैं। ऐसे हैं शिव। शिव का जननायक रूप ही जनमानस में औघड़दानी के रूप में प्रचलित हो गया है। उसे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। दूसरों के लिए सब कुछ-
‘अनका ला दानी भोला अपने भिखारी हो
अनका ला काठा अटारी महल तैयारी हो,
अपना ला टुटली मड़ैया बनल तैयारी हो।‘
लोकगीतों में शिव के दूल्हा रूप का विशेष वर्णन है। दरवाजे पर शिव की बरात देख कर मैना रोने लगती हैं- ‘शिव जी केआबेला बरात, हो डेराला जियरा। ’भूत-वैताल-डाकिनी-साकिनी नाच रही हैं। सांप फुफकार कर रहा है। मैना कहती हैं- ‘एहन वौराहा वर संग गौरी न विआहव बड़ गौरा रहती कुआरी’। लोकमन पर छाए शिव के रूप का अंश आज भी हर पुरुष में देखा जाता है।

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