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हंगामे की मर्यादा

मंगलवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जो अमंगल हुआ, वह परेशान करने वाला है। वैसे जब से यह सत्र शुरू हुआ है विधानसभा में कई अशोभनीय दृश्य दिखाई दिए हैं। विधानसभा में हंगामी बहसें उग्र तेवरों के साथ कभी-कभार हों, इसमें सभी का हित है - देश का भी, प्रदेश का भी और वहां की राजनीति का भी। इस सबसे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। विधानसभा में अगर पक्ष और विपक्ष के विधायक जनता से जुड़े मसलों को लेकर जमकर जूझते हैं तो लोगों को इसमें भी एक उम्मीद दिखाई देगी। विधानसभा की प्रक्रिया से लोग जितनी ज्यादा उम्मीद लगाएंगे उग्रपंथी और आतंकवादी उतना ही हाशिये पर चले जाएंगे। लेकिन इस तरह के बहस, हंगामों, बायकॉट वगैरह का अर्थ तभी तक है, जब तक वह उस मर्यादा के भीतर हों, जो हमें लोकतंत्र की संस्थाओं ने दी है। विधानसभा में जो हुआ उसने इस मर्यादा की सीमाएं तो पार कर ही दीं, साथ ही उसमें गैर-जिम्मेदारी का भाव भी था। तीन साल पहले हुए सेक्स कांड का मामला उठाते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के चरित्र पर लांछन एक ऐसे विधायक ने लगाया जो इस कांड के समय खुद राज्य का कानून मंत्री था। आरोप लगाने वाले मुजफ्फर हुसैन बेग अब भले ही इस पर लीपा-पोती कर रहे हों, लेकिन यह आरोप इतना गंभीर तो था ही कि कोई भी लांछित व्यक्ति तैशमें आ जाता। इसलिए उमर अब्दुल्ला ने इस पर जो प्रतिक्रिया दी, उसे आसानी से समझा जा सकता है।

विधानसभा या कोई भी निर्वाचित सदन बहस करने और विरोध दर्ज कराने की जगह है, कीचड़ उछालने की नहीं। राजनैतिकविरोध जरूरी है और यह जमकर होना भी चाहिए, लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आप किसी भी तरह से दूसरे पक्ष को नीचा दिखाने पर तुल जाएंगे। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य के जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी इस मामले में ज्यादा बड़ी है। वह एक ऐसा राज्य है, जहां बंदूकें अक्सर विधायिका का विकल्प बनने की उतावली में नजर आती हैं। कश्मीर में हमारे पास एक ओर उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सईद जसे युवा नेता हैं, दूसरी ओर कांग्रेस के अपेक्षाकृत पिछली पीढ़ी वालेअनुभवी गुलाम नबी आजाद हैं। फिलहाल हमें इन्हीं के जरिये ही कश्मीर को शांति की ओर ले जाना है, इन्हीं के जरिये कश्मीर समस्या का समाधान खोजना है। सिर्फ राजनीति के लिए इनमें से किसी का चरित्र हनन लोकतांत्रिक राजनीति की गुंजाइश को ही खत्म कर सकता है।

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