अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यह बलूचिस्तान कहां से आया?

यह समझ में नहीं आ रहा कि शर्म-अल-शेख में भारत-पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच वार्ता तो पाकिस्तान प्रेरित व संचालित आतंकवाद पर होनी थी, विशेषकर 26/11 के मुंबई आतंकी हमले की, मगर उस में बलूचिस्तान का जिक्र कहां से आ गया? यहां असंतोष के कारण कुछ भी रहे हों, भारत का उससे क्या लेना देना, और संयुक्त वक्तव्य में उस मसले का जिक्र भारत के इरादों पर मढ़ने का मुद्दा पाकिस्तान को खामख्वाह मिल गया। भारतीय उच्च अधिकारियों का मानना है कि संयुक्तड्राफ्ट में कमियां थीं यह सब इसी कारण हुआ। तो पूछा ज सकता है कि वे कमियां कैसे आईं, क्या कर रहे थे, हमारे अधिकारी जब संयुक्त ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा था? समय लगेगा बलूचिस्तान की धुंध को दूर करने में।

डॉ. आर. के. मल्होत्रा,  नई दिल्ली

हिन्दी के लिए मैदान में डटो

हिन्दी अकादमी के नए अध्यक्ष को लेकर खींचतान जारी है। डॉ. चक्रधर व डॉ. जोशी की सेनाएं मैदान में डट गई हैं। पृथ्वी और स्वर्ग में विराजमान विख्यात चिंतक, लेखक, साहित्यकार असमंजस में हैं कि इस पद पर सेना का कौन सा खजाना लटका है कि कोई भी अपनी मूछें झुकाने को तेयार नहीं। हिन्दी भाषा का भला कैसे होगा? आज चूल्हे-अंगीठी की रोटी खा कर अंग्रेज बने भारतीय जब भी किसी विभाग में जाते हैं तो उसे हिन्दी बोलने वाला कर्मचारी देहाती ही दिखाई देता है। इसलिए इन सज्जनों को खींचतान में इतनी ताकत ‘हिन्दी भाषा’ के लिए लगानी चाहिए। इससे तो अच्छी हमारी भोजपुरी, मैथिली, हरियाणवी, राजस्थानी फिल्में हैं। जो किसी न किसी रूप में, प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से पूरे भारत में हिन्दी का प्रचार कर रही हैं।

राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

रिश्तों का गला मत घोटो

अब तक तो घरेलू हिंसा का खामियाज केवल स्त्रियां ही भुगतती आई थीं किन्तु प्रसाद नगर की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि न केवल स्त्रियां बल्कि परिवार का कोई भी सदस्य अछूता नहीं है। पिता की हत्या, मां द्वारा बेटियों की हत्या, पत्नी की हत्या, पति की हत्या में पत्नी शामिल आदि इस प्रकार की वारदातें अखबार में खबर बनने के अतिरिक्त आम जन के बीच बातचीत का मुद्दा बनती जा रही है। किन्तु यह जानने को कोई इच्छुक नहीं है कि इस आपसी हिंसा वैमनस्य का कारण क्या है? अपनो का जीवन क्या केवल भौतिक और आर्थिक सुखों के लिए ताक पर रखना उचित व नैतिक है?

शक्तिवीर सिंह ‘स्वतंत्र’, जमिया

दाल का भाव रुपया

भारतीय भोजन की श्रृंखला में दाल-रोटी को हमेशा से ही आदर्श भोजन का स्थान प्राप्त रहा है। दालों को अमीर से लेकर गरीब की रसोई में पकने का सौभाग्य प्राप्त है। दालों की कीमत आज आसमान छू रही हैं। बेहिसाब बढ़ी हुई कीमतों के कारण दालों की प्रजति का भविष्य खतरे में है। दालों ने कितने ही हिन्दी के मुहावरों को भी जन्म दिया है, जिनमें मुंह और मसूर की दाल, घर की मुर्गी दाल बराबर, दाल नहीं गली, दाल में काला आदि प्रमुख हैं। दालों के साथ एक नया मुहावरा ‘आमदनी अठन्नी दाल का भाव रुपया’ जोड़ा जा सकता है जिसके भुक्तभोगी हम सभी हैं।

पंकज भार्गव, कंडोली, देहरादून

हाय री सड़क
सावन के लिए
बद्दुआ करती हैं सड़कें,
दो-चार बूंदे गिरते ही
मरती हैं सड़कें।

वीरेन कल्याणी, शाहदरा , दिल्ली

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:यह बलूचिस्तान कहां से आया?