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सच के साथ, बाजारू प्रयोग

सच के साथ, बाजारू प्रयोग

सत्य के साथ एक प्रयोग महात्मा गांधी ने किया था, जिसके जरिए उन्होंने नैतिकता, सदाचार और सत्य की ताकत के बारे में बताया था। गांधी जी का यह प्रयोग महज एक प्रयोग ही नहीं था, बल्कि सच की ताकत को उन्होंने अपने मन, वचन और कर्मो के जरिए साबित भी किया था। लेकिन सत्य के साथ एक और प्रयोग आजकल चल रहा है। लेकिन ये सत्य एक साथ कई भाव पैदा करता है- जुगुप्सा, कौतुहल, हैरानी। साथ ही तमाम अतंर्विरोधों वाले भारतीय समाज के पाखंड को भी उजागर करता है। दुनिया इसे मोमेंट आफ ट्रूथ के नाम से जानती है। हमारे देश में इसका नाम है ‘सच का सामना।’ यह एक रियलिटी शो है, जो जबरदस्त रूप से चर्चा में है। एक ओर ये जम कर टीआरपी बटोर रहा है तो दूसरी ओर इसके खिलाफ विरोध के स्वर भी लगातार मुखर होते जा रहे हैं।

अमेरिका के फॉक्स टीवी के ब्रेन चाइल्ड इस शो को आमतौर पर दुनिया में जहां भी दिखाया जा रहा है, वहां इसका विरोध हो रहा है। ये न केवल विवादों को न्योता दे रहा है, बल्कि इसमें हिस्सा लेने वालों के घर भी टूट रहे हैं। उनके नाते-रिश्तेदार उनसे किनारा कर रहे हैं। मित्र उन्हें पास नहीं फटकने देते। इसके सवाल आपकी जिंदगी के वो सारे राज खोल देते हैं, जो आप न जाने कितनी गहराई में दबा कर चैन की बंसी बजा रहे होते हैं, लेकिन पैसे के चक्कर में लोगों को वो भी मंजूर है। यहां सच और झूठ का फैसला पॉलिग्राफ मशीन करती है। हालांकि ये बात अलग है कि तमाम देश पॉलिग्राफ मशीन को सच-झूठ मापने के लिए अब विश्वसनीय नहीं मानते। तो ये शो ‘सच का सामना’ के नाम से हमारे यहां भी शुरू हो चुका है। सच के नाम पर ये जो कुछ परोस रहा है, वो आमतौर पर लोगों को बेहद आपत्तिजनक लगता है, कहीं-कहीं अभद्र भी। लेकिन न पसंद करते हुए भी दर्शक इसे देख रहे हैं, लोगों की बेहद निजी जिंदगी के राज जिस तरह से उनके सामने खुल रहे हैं, वो उनके लिए एक नया रोमांच टूर बन कर आया है।

बेशक लोकसभा में इसे लेकर सवाल भी उठ चुके हैं। सूचना प्रसारण मंत्रलय से इसकी स्क्रीनिंग की मांग की जा चुकी है। सरकार ने चैनल को नोटिस भी भेज दिया है। लोग अदालतों की शरण में भी पहुंच रहे हैं। बहुत से संगठन इसके खिलाफ लामबंद होने की योजना बना रहे हैं।
शो में किस तरह के सवाल पूछे जाते हैं इसकी बानगी-

मुंबई की एक महिला स्मिता मथाई एंकर राजीव खंडेलवाल के सामने बैठी हैं। अपनी जिंदगी के कई राज वो खोल चुकी हैं। उनके हर सवाल के जवाब के बाद उनके सामने बैठे उनके पति और मां के चेहरों पर बराबर कोई भाव आ और जा रहे हैं। तभी राजीव उनसे ऐसा सवाल पूछते हैं, जिसे किसी भी तरह से अभद्रता ही माना जाना चाहिए। ..क्या आप अपने पति की जानकारी के बगैर किसी अन्य पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाना चाहेंगी? जवाब में वो नहीं कहती हैं.।लेकिन पॉलिग्राफ मशीन उनके जवाब को झूठ बताती है। स्मिता एकबारगी स्तब्ध रह जाती हैं। सामने उनका पति हताशा में सिर पकड़ कर बैठ जाता है। स्मिता बिना एक भी पैसा जीते घर लौटती हैं। लेकिन एक दरार ने उनके परिवार में दस्तक तो दे ही दी है। कई सवाल और भी उभरते हैं कि क्या इसके बाद स्मिता का जीवन सामान्य रह पायेगा? वो किस तरह से परिचितों का सामना कर पायेंगी?

इसी तरह टीवी अभिनेत्री उर्वशी ढोलकिया से सवाल पूछा जाता है ..क्या आपको कॉलेज से इसलिए निकाला गया था, क्योंकि आप नाबालिग उम्र में प्रेगनेंट हो गयी थीं? उर्वशी मुस्कराती हैं। कहती हैं-मै बेशक प्रेंगनेंट थीं, लेकिन मुझे इस वजह से नहीं निकाला गया। एक अन्य पुरुष प्रतियोगी से सवाल होता है कि क्या जब आप अपनी पत्नी से सेक्स संबंध बना रहे होते हैं तो आपके दिमाग में दूसरी स्त्रियां भी होती हैं? जवाब आता है ‘हां’।

सामने बैठी पत्नी का चेहरा फक पड़ जाता है। बस वो किसी तरह से ही अपना रोना रोक पाती है। सास स्तब्ध रह जाती है। ये तो बानगी भर है। आमतौर पर इस शो के सवाल आपके नाजायज सेक्स संबंधों की स्वीकृति या ऐसे गुनाहों पर टिके होते हैं, जिसका सच या झूठ दोनों आपको उस मोड़ पर लाकर खड़े कर सकता है, जिसके बाद आप लांछनों, व्यंग्यों की मार बर्दाश्त करते-करते टूट सकते हैं। और ये सब किस लिए? महज पैसों के लिए या प्रचार के लिए? वो सच, जिसे आपने आज तक सबसे छिपाया, वो सरेआम सरेदुनिया आपको तार-तार कर देता है। उसके साथ ही एंकर सच को लेकर एक नई परिभाषा गढ़ कर यूं पेश कर देगा, मानो आपने मानवता के लिए कितना बड़ा काम कर डाला है।

लेकिन अगर चैनल के नजरिए से देखा जाये तो ये शो उसके लिए एक बड़ी ताकत बन कर आया है। पहला एपीसोड 4.6 टीवीआर यानी टेलीविजन व्युअर रेटिंग से शुरू हुआ। इतनी टीवीआर के साथ धमाकेदार एंट्री लेने वाले गैर-फिक्शन केटेगरी का, इस साल का यह पहला शो है। यही नहीं, इस टाइम स्लॉट में इस शो ने दूसरे सारे चैनलों को कहीं न कहीं पीछे छोड़ा है। इसने 4.3 का टीवीआर बरकरार रखा है। लॉन्च से पहले रात 10.30 से 11.00 बजे तक चैनल पर इस टाइमस्लॉट का टीवीआर 0.8 था। यानी प्रोग्राम ने उसे गजब की उछाल दी है।
टैम आंकड़ों के अनुसार, यह शो देखते ही देखते टॉप टेन शोज में शुमार हो चुका है। हकीकत यह भी है कि विवाद और विरोध प्रोग्राम के लिए कैटेलिस्ट यानी उत्प्रेरक का काम कर रहे हैं। चैनल के कर्ताधर्ता खासे उत्साहित हैं। चैनल के एक आला अधिकारी के मुताबिक, यह एक प्रायोगिक शो है, जो बहुत बढ़िया काम कर रहा है यानी सारी लड़ाई टीआरपी की है, इसके लिए आप चाहे जो परोस दो।

इस स्थिति पर प्रसिद्ध कथक गुरु बिरजू महाराज अफसोस जाहिर करते हैं। बकौल बिरजू महाराज, ‘इस तरह के शो दिखाना उचित नहीं है। चैनल के लोगों को समझना चाहिए कि वो क्या दिखा रहे हैं और इसका क्या असर पड़ सकता है।’ वह कहते हैं कि टीवी पर रियलिटी शोज के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, वह वाकई बहुत गंदा है। क्या भारत की संस्कृति को बचाना सबकी जिम्मेदारी नहीं है? साथ ही सवाल भी करते हैं कि क्या वाकई कहीं सेंसर है?

‘सच का सामना’ के मूल विदेशी संस्करण मोमेंट ऑफ ट्रूथ को परिवारतोड़ प्रोग्राम माना जाने लगा है। इस प्रोग्राम में हिस्सा लेने वाले प्रतियोगियों के तलाक का शिकार होने की दर सबसे ज्यादा है। यूरोप और अमेरिका जैसे उन्मुक्त समाज तक में इसके प्रतियोगी सबसे ज्यादा शर्मिदगी झेलते हैं, परिजनों से उनके ताल्लुकात टूट रहे हैं। बड़े पैमाने पर इसकी आलोचनाएं हो रही हैं। फॉक्स टीवी का यह शो वह सारी सीमाएं तोड़ रहा है, जो आज तक कभी नहीं हुआ। विदेश में मीडिया का एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि यह प्रोग्राम घर तोड़ने के लिए ही बनाया गया है। सच को जाहिर करने की होड़ इसलिए है, क्योंकि इसके बदले शो एक मोटी रकम देता है। भारत में विभिन्न पायदानों के जरिए प्रतियोगी एक लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक की धनराशि जीत सकते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के एक कॉलमिस्ट लिखते हैं, ‘मैने जब इस शो को देखा तो दहल ही गया। पैसे के बदले लोग अपनी आत्मा बेच रहे हैं।’

जाने-माने रंगकर्मी और अभिनेता रामगोपाल बजाज मानते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों के लिए हमारा देश तैयार नहीं। सबसे दुखद पहलू यह है कि इसकी मार दोधारी है-एक पक्ष अपने जो भी स्याह रहस्यों को उद्घाटित करता है, वह तो प्रभावित होता ही है, उसका असर दूसरों पर भी पड़ता है, उनकी भावनाएं भी आहत होती हैं। उन्होंने जो नहीं किया, उसकी सजा उन्हें मिलती है, इसलिए ऐसे प्रोग्राम स्वागतयोग्य नहीं कहे जा सकते।

भारतीय समाज का ताना-बाना देखें तो वाकई ऐसे प्रोग्राम यहां पर खासा बुरा प्रभाव पैदा कर सकते हैं, क्योंकि हमारे यहां नाते-रिश्ते आज भी खासे मायने रखते हैं और लोग भावनात्मक तौर पर एक-दूसरे से खासे जुड़े हुए हैं। यह बात सही है कि हमारे समाज में बहुत से अंतर्विरोध हैं, बेड़ियां हैं, तमाम कड़वी सच्चइयों को दबा कर रखने की परंपरा रही है। शायद इसलिए कि जीवन में उजले पक्ष को देखा जाये। फिर भारतीय संस्कृति हमेशा से शुचिता और नैतिकता की हामी रही है। ऐसे में ..सच का सामना.. जैसा प्रोग्राम एकबारगी झकझोर देता है। आप अपने सामने सच के रहस्योद्घाटन देख कर स्तब्ध हो सकते हैं। लेकिन यह बात भी सही है कि भारतीय समाज बदल रहा है, ग्रंथियां खुलने लगी हैं, वजर्नाएं टूट रही हैं, सही-गलत के मायने भी बदल रहे हैं। ऐसे में कुछ लोगों का तर्क यह भी है कि आज से दस साल पहले इस तरह का शो कोहराम मचा सकता था, लेकिन पश्चिमी अंधानुकरण की ओर तेजी से पैर फैलाती हमारी जीवनशैली में अब वह सब कुछ स्वीकार्य होता जा रहा है, जो कल तक नहीं था। ‘सच का सामना’ जैसे सच को पचाना भी अब कुछ हद तक संभव हो गया है। कुछ लोगों का तर्क यह भी है कि अगर इसे सकारात्मक तौर पर देखें तो टूटे रिश्तों को फिर जोड़ने में भी सहायक हुआ है। कम से कम विदेशों में तो ऐसा हो चुका है।

गृहिणी पूनम सक्सेना कहती हैं, इस तरह के प्रोग्राम में बुराई क्या है, आपने जो कुछ किया, उसकी सच्चाई ही तो बाहर आ रही है और आपको अगर लगता है कि आपके अंदर डार्क सीक्रेट्स हैं, इसका गलत प्रभाव पड़ सकता है तो आप इस शो में मत आइये। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र सलमान कहते हैं कि इस शो को देख कर आंखें खुल जाती हैं कि हमारे आसपास के लोग और ये सिलेब्रिटीज ऊपर से क्या हैं और अंदर से क्या हैं। कई बार ऐसे शो के जरिए हम खुद के व्यवहार को आंक सकते हैं। बहुत सी सिलिब्रिटीज अभी इस शो पर हमें नजर आएंगी, जिसमें बॉबी डार्लिग से लेकर एक्टर राजा चौधरी तक शामिल हैं, लेकिन बहुत-सी बोल्ड मानी जाने वाली हस्तियों ने इसमें आने से साफ मना भी कर दिया, जिनमें चंकी पांडेय, विक्रम भट्ट, फिजा, महेश भट्ट जैसे लोग हैं। बताते हैं कि महेश भट्ट ने यह कहा है कि अगर मैं इस शो में आ गया तो मेरे सच से मेरे दुश्मन ही नहीं, कई दोस्तों को भी गहरा आघात लगेगा। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की चेयरपर्सन और प्रसिद्ध रंगकर्मी अमाल अल्लाना का मानना है कि आइडिया के तौर पर तो ये बहुत अच्छा है, लेकिन हमारे चैनल जिस तरह से रियलिटी शोज दिखाते हैं, वो तरीका ठीक नहीं। जो कुछ सामने आता है, वो वाकई क्रूड लगता है। वह यह भी कहती हैं कि सच को सामने लाने के और भी तरीके हैं, तो ऐसा क्यों किया जाये कि सच, सच न रहकर सनसनी बन जाये। अंत में सूचना यह है कि कोलंबिया के साथ-साथ ग्रीस में इस शो पर बैन लगाया जा चुका है। कुछ और देशों में इसका जबरदस्त विरोध हो रहा है।

ये बेहद आपत्तिजनक प्रोग्राम है, इसे बंद होना चाहिए। हल्के-फुल्के रियलिटी शोज तो ठीक हैं, लेकिन इसका इरादा बहुत गंदा है। यह जुगुप्सा जगाता है। दरअसल सच के बहाने आपकी गलतियों, अनैतिकताओं को बाजार से जोड़ दिया गया है। सच आप इसलिए बोल रहे हैं, क्योंकि इसके बदले पैसा मिलना है। सच को लालच से मुक्त करके पूछिए, तब तो कोई बात है।

मैने ये शो देखा है- काम्बली या कई दूसरे लोगों, जो इस प्रोग्राम में आकर सच के इतने बड़े पैरोकार बन रहे हैं, उन्हें अगर वाकई सच से इतना ही प्यार था तो अब तक आत्मकथा लिख देनी चाहिए थी। यह प्रोग्राम भारतीय मूल्यों का अपमान है।

मनोवैज्ञानिक असर !
हमारी जिंदगी में जो कुछ भी होता है, वह किसी न किसी रूप में हमें मानसिक तौर से प्रभावित करता है, लेकिन यह प्रभाव किस सीमा तक होता है, यह व्यक्ति, घटना पर निर्भर करता है। जहां तक इस शो की बात है तो इस शो से प्रभावित होना या किसी व्यक्ति की जिंदगी में बदलाव आना उस व्यक्ति की पर्सनेलिटी पर निर्भर करता है। कहने का मतलब यह है कि कोई व्यक्ति, अपने जीवन में किसी बात को किस प्रकार लेता है, यह उसके अनुभव, कार्य आदि पर आधारित होता है। मैंने गौर किया है कि इस शो में प्रतिभागी लोगों के लिए रोल मॉडल की तरह होता है, उनकी प्रेरणा होता है।

हालांकि यह संभव है कि शुरुआत में प्रतिभागी प्रश्नों के जवाब देने में असहज महसूस करें, लेकिन थोड़ी देर में या फिर कहें कि एक बार किसी अनापेक्षित प्रश्न के पूछे जाने के बाद वह सहज महसूस करता है- संजय चुघ (जाने-माने मनोचिकित्सक)

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