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परमाणु पनडुब्बी

हाल में ‘अरिहंत’ नामक देश में ही निर्मित परमाणु पनडुब्बी देश की सेवा में समर्पित की गई। परमाणु पनडुब्बी की खासियत यह होती है कि वह परमाणु रिएक्टर से चलाई जाती है। अन्य पनडुब्बियां डीजल या बिजली से चलती हैं। इसके अलावा परमाणु पनडुब्बियों को बार-बार समुद्र की सतह पर भी लौटने की जरूरत नहीं होती और यह लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती हैं। मौजूदा परमाणु पनडुब्बियों को उनके पच्चीस वर्ष के जीवनकाल में कभी ईंधन की आवश्यकता नहीं पड़ती। लेकिन इनकी निर्माण लागत अधिक होने के कारण बहुत कम राष्ट्र ही अपनी नौसेना के जखीरे में परमाणु पनडुब्बियां शामिल कर पाए हैं।

पहली परमाणु पनडुब्बी अमेरिका ने 1954 में बनाई थी जिसका नाम था ‘नॉटिलस’। यह चार महीने तक बिना सतह पर लौटे दुनिया का चक्कर लगा सकती थी। इसके बाद सोवियत रूस ने 1958 में अपनी पहली परमाणु पनडुब्बी तैयार की थी। 1950 के दशक से 1997 तक रूस ने 245 परमाणु पनडुब्बियों का निर्माण किया था। यह संख्या अन्य सभी देशों की कुल पनडुब्बियों से अधिक थी।

आज दुनिया के छह देशों, अमेरिका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, चीन और भारत की नौसेनाओं के पास परमाणु पनडुब्बियां हैं। अज्रेन्टीना और ब्राजील अपने लिए परमाणु पनडुब्बियां बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

परमाणु पनडुब्बियों और अन्य पनडुब्बियों के बीच मुख्य अंतर ऊर्जा उत्पादन का होता है। परमाणु पनडुब्बियों में ऊर्जा इलैक्ट्रिक मोटरों की मदद से उत्पन्न की जाती है। इसके लिए उच्चकोटि का परिष्कृत ईंधन इस्तेमाल किया जाता है। इसके अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा पनडुब्बी के अन्य सिस्टमों को भी ऊर्जा सप्लाई करता है। इसमें वायु, पानी सप्लाई, तापमान स्थिर रखना आदि। वैसे मौजूदा तमाम नौसेना के परमाणु रिएक्टर डीजल चालित हैं और यह ऊर्जा का बैकअप तैयार करते हैं।

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