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कार्डिएक अरेस्ट हार्ट अटैक का बाप

सडन कार्डिएक अरेस्ट.. यानी दिल की धड़कन के अचानक थम जाने को लोग अक्सर हार्ट अटैक या दिल का दौरा मानने की भूल कर बैठते हैं। लेकिन इन दोनों में कुछ-कुछ वैसा ही अंतर है, जैसा कि वायरिंग (बिजली की लाइन) और प्लंबिंग (पानी की लाइन) में। हम कह सकते हैं कि हाल में पॉप स्टार माइकल जैकसन की मौत ने दिल के दीगर इलेक्ट्रिक पहलुओं के साथ-साथ कार्डिएक अरेस्ट को भी फोकस में ला दिया है, जो कि हार्ट अटैक से बिलकुल अलग हैं।

हार्ट अटैक वैसे ही है, जैसे हमारे घर में पानी का नल या नाली, कचरा या अन्य किसी अवरोध के चलते जाम हो जाती है। दरअसल धमनियों में ब्लॉकेज की वजह से जब दिल को खून की सप्लाई रुक जाती है, तो हार्ट अटैक होता है। हार्ट मुख्य तौर पर खास तरह के कार्डिएक मसल टिश्यूज से ही बना होता है। इसलिए जब खून की सप्लाई रुक जाती है, तो हार्ट की संबंधित मांस पेशी मर जाती है, और मरीज को दिल का दौरा पड़ जाता है।

जबकि कार्डिएक अरेस्ट हमारे दिल के सिस्टम में शॉर्ट सर्किट या इलेक््रिटकल फेल्योर की तरह से होता है। जब हमारे दिल की धड़कनों के समय और गति को नियंत्रित करने वाली स्नायुओं में इलेक्ट्रिकल सिग्नल गड़बड़ा जाते हैं, तो दिल धड़कना बंद कर देता है, और ब्रेन में ऑक्सीजन न पहुंचने के कारण अचानक मरीज की मौत हो जाती है। दिल की सामान्य धड़कन में बाधा पहुंचाने वाले कई फैक्टर हैं- वाइरल बुखार से लेकर दर्दनाशक गोलियों और ड्रग्स की ओवरडोज तक।

इसीलिए चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में मजकिया तौर पर हृदयरोग विशेषज्ञों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है- प्लंबर और इलेक्ट्रिकल। डॉ. प्लंबर दिल की धमनियों की जांच किया करते हैं और इनमें जमे कचरे या लीकेज को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी उठाते हैं। वे यह काम स्टेंट लगाकर, या फिर नए पाइपों की कटाई-सिलाई करके खून की सप्लाई का नया रास्ता बनाकर करते हैं, जिसे बाइपास सजर्री कहा जता है। जबकि डॉ. इलेक्ट्रिकल हार्ट के इलेक्ट्रिकल सर्किट की वायरिंग के नेटवर्क को ठीकठाक करके दिल की धड़कन को सामान्य गति पर ला देते हैं।

क्या दिल अचानक रुक सकता है?
हममें से अधिकतर लोग हार्ट अटैक और धमनियों में ब्लॉकेज के खतरों से वाकिफ हैं, और ये भी जानते हैं कि भारतीय मरीज मैटाबॉलिक सिंड्रोम के प्रति ज्यादा ही संवेदनशील होते हैं, जो खतरे को और ज्यादा बढ़ा देता है। मगर हार्ट अटैक से मौत का खतरा, सडन कार्डिएक अरेस्ट की बनिस्पत काफी कम ही होता है। डॉक्टर कहते हैं कि कार्डिएक अरेस्ट के शिकार मरीज की जान बचाने के लिए उनके पास केवल सात मिनट का समय होता है, जबकि हार्ट अटैक से होने वाले डेमेज को रोकने के लिए 20 मिनट मिलते हैं, और थोड़ा बहुत डेमेज होने के बाद भी मरीज की जान बचाना मुमकिन हो सकता है।

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के आकलन के मुताबिक कार्डिएक अरेस्ट होने पर 95 प्रतिशत मरीजों की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो जाती है। पेसमेकर बनाने वाली कंपनी मेडट्रॉनिक इंडिया के अनुसार, भारत में हर साल 5 लाख लोग सडन कार्डिएक अरेस्ट के कारण मर जाते हैं। इस आंकड़े से डॉक्टर भी इत्तेफाक रखते हैं। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि इनमें से ज्यादातर मौतों को रोका ज सकता है।

सडन कार्डिएक अरेस्ट अमूमन उन लोगों को होता है, जिन्होंने इससे पहले सेहत संबंधी खास परेशानियों का सामना नहीं किया होता। लेकिन सच बात तो ये है कि उन्हें परेशानी तो पहले से होती है, लेकिन अंत तक उन्हें इसका पता ही नहीं चलता।

दिल की वायरिंग
मौत का सबब बनने वाले ज्यादातर कार्डिएक अरेस्ट, दिल की धड़कन के अनियमित होने का नतीज होते हैं। यह तब होता है, जब दिल अचानक बहुत तेजी से धड़कने लगे, या फिर अटक-अटक कर बहुत ही मंथर गति से धड़क रहा हो। कभी-कभी अनियमित धड़कन से, जिसे अरिद्मिया कहते हैं, दिल की धड़कन टूट जाती है और यही कार्डिएक ‘अरेस्ट’ कहलाता है।

कार्डिएक अरेस्ट की इस जानलेवा बीमारी की मूल वजह हार्ट का वायरिंग सिस्टम है, जिसमें स्नायुतंत्र का जल नब्ज को बुरी तरह झिंझोड़ कर रख देती है, जिससे कई बार मिसफायर भी हो जाता है।

मुंबई यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और जसलोक हॉस्पिटल के डायरेक्टर ऑफ कार्डियोलॉजी डॉ. ए. बी. मेहता समझते हैं कि जब जब दिल के निचले चेंबर में नर्व सिग्नल जम हो जते हैं, तो कार्डिएक अरेस्ट होने की आशंका बढ़ जती है। अगर ऐसे में दिल की इलेक्ट्रो-फिजियोलॉजिकल जांच की जाए, तो इसका पहले से पता लगाया जा सकता है- और इससे कार्डिएक अरेस्ट को रोका जा सकता है।        

खतरा है, तो इलाज भी है
उन सब लोगों को, जिन्हें हार्ट की बीमारी है या अटैक हो चुका है, सडन कार्डिएक अरेस्ट हो सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि भारत में कोरोनरी आर्टरी डिजीज यानी सीएडी, डायबिटीज और हाइपरटेंशन के मामले खतरनाक गति से बढ़ते जा रहे हैं, जिससे (खासकर शहरों में) सडन कार्डिएक अरेस्ट ने भी अपना जाल फैला लिया है। हार्ट अटैक या ब्लॉकेज की हिस्ट्री वाले  मरीजों में से 80 प्रतिशत को पेसमेकर या आईसीडी लगवाना पड़ता है।

अपोलो हॉस्पिटल, दिल्ली में हार्ट की इलेक्ट्रो-फिजियोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. बलबीर सिंह के अनुसार तीन प्रकार के मरीज सडन कार्डिएक अरेस्ट के ज्यादा शिकार होते हैं: वे जिन्हें हार्ट अटैक पड़ चुका है, जिनको कार्डिएक मायोपैथी (शराब, ड्रग्स या वायरल बुखार की वजह से दिल की मांसपेशियों में जलन) की शिकायत हो और खानदानी तौर पर दिल के मरीज।

लक्षण : नब्ज टूटती हो, दिल में जलन हो, धड़कन गड़बड़ाती हो, कभी-कभी बेहोशी आने लगे, तो कार्डिएक अरेस्ट के प्रति सावधान हो जाना चाहिए।

जांच कराएं : ईसीजी, टू-डी ईको और 24 घंटे की हॉल्टर मॉनिटरिंग।

इलाज क्या है : गड़बड़ को दुरुस्त करना। वेंट्रिकुलर अरिद्मिया, यानी दिल की वायरिंग फॉल्ट को पेसमेकर और आईसीडी (इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डी-फाइबिलेटर) जैसे इलेक्ट्रिकल कार्डिएक डिवाइस लगाकर ठीक किया जा सकता है। ये डिवाइस बैकअप का वही काम करता है, जो घर में बिजली चले जाने पर जेनसेट या इनवर्टर करता है। पिछले साल हिंदुस्तानी दिलों में ऐसी 18,000 मशीनें और 1,50,000 स्टेंट लगाए गए थे

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