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‘विक्रमादित्य’ और ‘अरिहंत’: सच का सामना

भारत सरकार द्वारा रूस से विमान वाहक पोत एडमिरल गोर्शकोव की खरीद में घपले-घोटाले के रहस्योद्घाटन ने एक नये विवाद को अचानक जन्म दे दिया है। रक्षा सौदों में घोटालों की परंपरा पुरानी है- नेहरू युग में जीप खरीद से लेकर राजीव के जमाने में बोफोर्स तोपों तक। इस बार जो बात फर्क है, वह यह कि पर्दाफाश किसी सनसनीखेज़ खोजी पत्रकार ने नहीं किया, बल्कि यह बात नियंत्रक व लेखा महानिरीक्षक  यानी कैग की रिपोर्ट में सामने आई है।

सरकार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि उसने रूसी नौसेना के कबाड़ को जो कौड़ियों के मोल भी नहीं बिक सकता था, हीरे-जवाहरात से महंगा खरीदा है। अरबों रुपए पेशगी देकर उसने एक ऐसा जंगी जहाज जुटाया है, जो काफी बुढ़ा चुका है। इसे एक बार आग लगने से भी काफी नुकसान हुआ था और चाहे जितना भी रंग-रोगन लीपा-पोता जाए, इसका श्रृंगार नए नवेले नौजवान जैसा नहीं हो सकता।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह बात दो टूक कही है कि इससे कहीं कम कीमत पर भारत एक नया विमान वाहक पोत खरीद सकता था। सबसे विचित्र बात तो यह है कि जब इस जहाज की खरीद का सौदा तय हुआ था, तब से अब तक इसकी कीमत में कोई तीन गुना इजाफा हो चुका है। कीमत में बढ़ोतरी रूसियों ने एकतरफा कर डाली और इस बारे में भारत के साथ कोई राय-मशवरा जरूरी नहीं समझ। एक बात और काबिले गौर है कि अभी भी मरम्मत और सुधार का काम पूरा नहीं हुआ है और यह अनुमान लगाया जाता है कि इसके भारत पहुंचते-पहुंचते और पांच साल लग जाएंगे।

एडमिरल गोर्शकोव का नाम बदलकर अब विक्रमादित्य कर दिया गया है। यह एक ऐसे विवेकशील मिथकीय शासक का नाम है, जिसे तर्कसंगत और न्यायोचित आचरण के लिए आज तक याद किया जाता है। जिस वक्त भारत ने यह विमान वाहक पोत खरीदने की पेशकश की थी, उस वक्त हमारा पुराना विमान वाहक विक्रांत खस्ता हाल हो चुका था और दूसरा कोई देश हमें विमान वाहक पोत बेचने को तैयार नहीं था।

अमेरिका समेत कोई भी पश्चिमी देश यह नहीं चाहता कि भारत का उदय एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ित के रूप में हो। विमान वाहक जहाज सिर्फ बड़ी शक्तियों का एकाधिकार समझे जाते हैं। सच तो यह है कि विक्रांत भी सेकेंड हैंड माल ही था, जिसे ब्रिटेन ने भारत को थमा दिया था। उस वक्त कीमत का सरदर्द किसी ने नहीं पाला था। यह जंगी जहाज भी लड़ाई से ज्यादा सलामी परेडों के काम ही आता रहा।

यह सच है कि रूस ने यह सौदा सिर्फ भारत का मन और मान रखने के लिए नहीं किया। कोई भी राज्य सबसे पहले अपने राष्ट्रहित की ही बात सोचता है। रूस ने अगर इस जहाज की बिक्री से मुनाफा कमाना चाहा तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता। उस वक्त रूस विदेशी मुद्रा का मोहताज था और सोवियत संघ के विघटन और विखंडन के बाद अराजकता की कगार तक पहुंच चुका था। रक्षा सौदे- पुराने मित्रों के साथ- उसके लिए प्राण रक्षक औषधि के समान थे। पुतिन की भारत यात्रा के दौरान यह बात कई बार कही गई थी कि वह इस सौदे पर हस्ताक्षर करने के लिए ही भारत आ रहे हैं। दूसरे शब्दों में संकेत यह था कि यदि भारत रूस से और बहुत कुछ साजो-सामान हासिल करना चाहता है तो उसे इस मामले में रूस की शर्तें माननी होगी।

इस बात को रेखांकित करना बेहद जरूरी है कि रूस के साथ भारत के सामरिक रिश्ते आज के नहीं बर्षो पुराने और गाढ़े वक्त में आजमाये हुए हैं। सुखोई विमान हो या ब्रrह्मोस प्रक्षेपास्त्र अथवा हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम इन सभी की नींव और रीढ़ रूस के साथ सहकार और सौदे ही है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि हमारी ऊर्जा सुरक्षा का एक बहुत बड़ा हिस्सा साइबेरिया में साखालिन का तेल भण्डार है। यहां भारत ने लगभग पांच अरब डॉलर का निवेश किया है और  लाभांश के रूप में अपनी पूंजी वापस भी पा ली है। रूस के साथ किए गए सौदों के लाभ लागत की पड़ताल समग्र रूप से की जानी चाहिए और किसी एक सौदे का शव परीक्षण करते वक्त अवसर लागत की बात भी की जानी चाहिए उस देश काल को ध्यान में रखते हुए जब यह सौदा तय किया गया हो।

मजेदार बात यह है कि जैसे ही विक्रमादित्य वाले सौदे का ‘घोटाला’ सुर्खियों में आया भारत की रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में एक नई और धमाकेदार उपलब्धि की घोषणा कर दी गई। अरिहंत नाम की एक परमाणविक पनडुब्बी का ‘लोकार्पण’ प्रधानमंत्री की पत्नी ने किया। राष्ट्र को यह भी बतलाया गया कि हिन्दुस्तान आज दुनिया के उन छह देशों में एक है, जिनके पास यह क्षमता है। साथ ही प्रधानमंत्री ने एक शांति प्रेमी भाषण दे डाला जिसमें यह बात साफ कर दी गई कि भारत किसी भी देश को अपना शत्रु नहीं समझता। यह सब साजो-सामान आत्मरक्षा के लिए जुटाया जा रहा है वगैरह। मगर आलोचक इस पराक्रम से ारा भी प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि यह सारा उद्यम एडमिरल गोर्शकोव उर्फ विक्रमादित्य वाले विवाद से ध्यान बंटाने के लिए था। वैसे भी यह मानने वाला कोई नादान ही होगा, जो इस उपलब्धि को स्वदेशी मान ले। पनडुब्बी की जो फोटो देखने को मिली है, उस पर गुजरे जमाने की रूसी परमाणविक पनडुब्बी की छाप साफ झलक रही है। समुद्री मोर्चे पर इसकी बाकायदा तैनाती पर अभी वक्त लगेगा।

जिस वक्त इस पनडुब्बी को सागर की ओर धकेलने के लिए नारियल फोड़ा जा रहा था, 143 रूसी मेहमानों को सादर बुलाया गया था जो बरसों से इस अभियान में हिन्दुस्तानी वैज्ञानिकों का हाथ बंटा रहे थे। इस सामरिक परियोजना में रूसी सहकार का महत्व इस बात से भी आंका जा सकता है कि इस मौके पर विशेष अथिति रूसी राजदूत ही थे। इस बात की सराहना की जानी चाहिए कि यूपीए सरकार ने एनडीए सरकार के कार्यकाल वाले रक्षा सौदे के भंडाफोड़ पर ढोल बजाने का लोभ त्यागा है।

इस सब का अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार नहीं होता या इन्हें सामरिक संवेदनशीलता के कारण कभी भी पारदर्शी नहीं बनाया जा सकता। हम यह भी जोड़ना चाहते हैं कि इस घड़ी जब अमेरिका हमारा सर्वे-सर्वा बनने की महत्वाकांक्षा पाल रहा है, उस वक्त रक्षा सौदों के सभी उपलब्ध विकल्पों को सुरक्षित रखना समझदारी है और घपलों-घोटालों को लेकर अनावश्यक उत्तेजना घातक सिद्ध हो सकती है।

pant@ gmail. com

लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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