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ब्लॉग वार्ता : पुतले का अंतिम संस्कार

विरोध-प्रदर्शनों का एक परमानेंट आइटम है-पुतला दहन। यह हमेशा किसी चौराहे या नुक्कड़ पर किया जाता है। पुतला दहन की तस्वीरें अखबारों में छपने लायक होती हैं और आज कल न्यूज चैनलों पर भी दिखाया जाता है। नेताओं के अलावा अब महेंद्र सिंह धोनी से लेकर सलमान खान तक के पुतले जलते हैं। इसी कड़ी में एक बाप ने अपनी जिंदा बेटी का पुतला जलाकर पुतला दहन की परंपरा को राजनीतिक से पारिवारिक कर दिया है। यानी अब आप अपने चाचा से नाराज हैं तो उनका पुतला दहन कर सकते हैं। शरद कोकास के ब्लॉग पास-पड़ोस पर जाइये। क्लिक कीजिए http:// sharadakokas. blogspot. com

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की घटना का जिक्र है। बालिग बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया तो पिता ने उसे फिल्मी स्टाइल में आज तू मेरे लिए मर गई है, टाइप का काम कर दिया। उसके पुतले का दाह-संस्कार किया और सर भी मुंडवाये। अखबार में शोक का विज्ञापन भी दिया। पुतले के साथ लड़की के कपड़े और तमाम सर्टिफिकेट भी जला दिये गए।

हमारा समाज प्रेम विवाह से परेशान हो गया है। शादी एक व्यक्तिगत फैसला है, बनाम सामाजिक फैसला है को लेकर टकराव है। नौटंकी से लेकर जघन्य हत्याएं हो रही हैं। अदालत ने कहा कि लड़की तो बालिग है, लेकिन समाज कैसे मान ले। वो अपनी हताशा कैसे व्यक्त करे। अब ये तो नहीं कह सकता कि देश आजाद करा कर हमसे गलती हो गई। न हम आजाद होते न ही बालिग के फैसले का सम्मान करने वाला कानून। दुर्ग से लेकर हरियाणा के जींद तक इस हताशा का सार्वजनिक प्रदर्शन हो रहा है।

शरद किसी डायरी की तरह समाज की बातें लिखते हैं। पुरातत्व के विद्यार्थी होने के कारण समाज, इतिहास और किस्सों को मिलाकर पुरातत्व के किस्सों को सजीव बनाते हैं। बताने लगते हैं कि बुद्घ के जीवन में उनकी मूर्तियां नहीं बनीं। बुद्घ के दो-तीन सौ साल बाद जब पश्चिमोत्तर से मूर्तिकार आए तो लोगों से सुनी बातों के आधार पर बुद्घ का चेहरा गढ़ दिया।

किसी भानपुरा गांव जाते वक्त लोगों को अन्नपूर्णा देवी की पूजा करते देख शरद रुक जाते हैं। करीब जाकर देखते हैं कि कुबेर की मूर्ति की पूजा हो रही है। किसी को मालूम नहीं कि ये कुबेर हैं। सब अन्नपूर्णा समझ कर पूजा कर रहे हैं। यह सवाल उठता रहता है कि यक्षिणी की मूर्तियों की पूजा क्यों नहीं होती। अर्धदेव-देवी घोषित कर मान्यताओं के सहारे देवलोक की कथाओं में भी हैसियत की दीवारें खड़ी की गई हैं।

शरद और उनके दोस्त के बीच संवाद चल रहा है। यार पहली बार कोई इंसान मरा होगा तो उसे गाड़ा गया होगा या जला दिया गया होगा। शरद कहते हैं कि अफ्रीका और यूरोप में शव को दफनाने की परंपरा न होती तो पृथ्वी के पहले मनुष्य के दर्शन ही न होते। हमने शवों को जलाकर इतिहास का बहुत नुकसान किया है।

किस्सागोई में निकली इन बातों पर एक इतिहासकार की नजर दौड़ती लगती है। दुर्ग जिले में एक बाप अपनी जिंदा बेटी का पुतला जला देता है। उसकी शवयात्रा निकालता है। शरद कहते हैं कि पहली बार किसी को मृत देख इंसान हैरान रह गया होगा। सवाल पूछा होगा कि इस शिथिल शरीर को हो क्या गया है। तब से मृत्यु के किस्से चले और परंपराएं बनीं। शरद प्रसिद्घ पुरातत्ववेत्ता विक्रम श्रीधर वाकणकर के साथ काम करने के अनुभवों को हिंदी में ब्लॉग पर उतार रहे हैं।

इतिहास का यह हिस्सा जटिल अंग्रेजी में लिखे जाने के कारण आम लोगों की दिलचस्पियों से दूर हो गया है, जिसे शरद किस्से में बदल कर जनसुलभ करा रहे हैं। शरद का रेंज सीमित नहीं है। वो अचानक हक्यरूलस की कथा सुनाने लगते हैं। यूनान के राजा अजियस के गौशाले में पांच हजार बैल थे। गोबर का पहाड़ जम गया। हक्यरूलस ने पास की नदियों पर बांध बना दिया। जैसे ही नदी का पानी भरा, बांध को तोड़ दिया। तेज धारा में गोबर के पहाड़ बह गए।

हक्यरूलस से निकल कर शरद मुहम्मद-बिन-तुगलक की बात करने लगते हैं। उसने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद करने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। शरद कहते हैं कि इसके बाद राजधानी बदलने की कई कामयाब कोशिशें हुई हैं। दिल्ली से कोलकाता, कोलकाता से फिर दिल्ली और बर्लिन से बन।

इतिहास क्या है। इस सवाल का जवाब शरद अपनी शैली में कुछ यूं देते हैं। इतिहास तो दरअसल मां के पहले दूध की तरह है, जिसकी सही खुराक पैदा करती है हमारे भीतर, मुसीबतों से लड़ने की ताकत, दुख सहन करने की क्षमता देती है, जो जीवन की समझ बनाती है, वह हमारे होने का अर्थ बताती है, हमें हमारी पहचान कराती है।

ravish@ ndtv. com

लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

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