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अमृत पद की प्राप्ति

ईशोपनिषद् में अमृत पद को हासिल करने की बहुत रोचक चर्चा की गई है। इस चर्चा में यह बताया गया है कि जो इंसान रूप प्रकृति और कारण रूप प्रकृति दोनों को साथ-साथ जनना चाहता है, वह ‘विनाश’ की प्रकृति के ज्ञान से मौत से छूटकर कार्य शरीर से ही अमृत पद को हासिल कर लेता है। यानी प्राकृतिक तत्वज्ञान के बिना आत्मा और ईश्वर का विवेक नहीं हो सकता, इसलिए जब मनुष्य प्रकृति की सच्चाई को जान लेता है, तब वह जन्म-मरण के बंधन से छूटकर शरीर से ही जीवन मुक्त दशा को हासिल कर परमपद यानी ईश्वर को प्राप्त कर लेता है।

शास्त्र में कार्य प्रकृति को संभूत कहा गया है और कारण प्रकृति को असम्भूति। सम्भूति ही सम्भव है और असम्भूति विनाश। इसी तरह तीन तरह के शरीरों की चर्चा की गई है। इनमें पहला स्थूल शरीर, दूसरा सूक्ष्म शरीर और तीसरा कारण शरीर। स्थूल शरीर का संबंध उन्नयन कोश से है। सूक्ष्म शरीर का संबंध प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय से है। सूक्ष्म शरीर में सत्रह पदार्थ हैं। इनमें पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच तन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध), पांच प्राण (प्राण, अपान, व्यायान, समान और उदान), एक मन और एक बुद्धि। शास्त्र के मुताबिक कारण शरीर से सूक्ष्म और स्थूल दोनों तरह के कार्य किए जते हैं। कारण शरीर का संबंध आनन्दमय कोश से है।

जब हम जागते रहते हैं तो हमारा संबंध तीनों तरह के शरीरों से बना रहता है। और जब हम स्वप्न देखते हैं तो हमारा संबंध सूक्ष्म और कारण शरीर से रहता है। जो व्यक्ति इन तीनों तरह के शरीरों का ठीक-ठीक ज्ञान रखता है, वह किसी भी तरह के बंधन, दुख या समस्या से परेशान नहीं होता है। सब कुछ संतुलित होता है। जीवन के चारों पुरुषार्थो- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के रास्ते पर बिना हिचक चलता रहता है। उसके लिए क्या बेहतर है और क्या बेकार है ठीक-ठीक वह समझता है। ऐसा व्यक्ति अपने कठिन तप से परमानन्द को हासिल कर लेता है।

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