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इस्तीफ़े पर निबंध

हमारा देश एक इस्तीफा प्रधान देश है। साल भर में जितने बेकारों की नौकरियां नहीं लगतीं, उससे ज्यादा नकारे इस्तीफा दे देते हैं। हमारे देश में अनाज की दो फसलें होती हैं- रबी और खरीफ। राजनीति की भी दो फसलें होती हैं- शपथ और इस्तीफा। पहले शपथ फिर इस्तीफा..फिर शपथ फिर इस्तीफा। भर्ती और छंटनी का यह सांस्कृतिक कार्यक्रम पूरे वर्ष चलता रहता है और यह महान देश अपना भूखा पेट बजा कर इसे देखता रहता है।

जिसे जाना होता है, वह दे देता है। अगला ले लेता है। इसे मंजूर कर ही लेना राष्ट्रपति या राज्यपाल की मजबूरी है, क्योंकि यही उनकी नौकरी है कि शपथ खिलाओ और इस्तीफा उगलवा लो। इस्तीफा दान एक छोटी सी क्रिया है। उठाई एक कलम और लिख दिया- जा ले जा अपनी गद्दी। नहीं बैठते। कल को जरूरत पड़े तो फिर बुला लेना। शपथ ले लेंगे। नेता हैं कोई दूध नहीं कि जम कर एक बार दही हो गया तो दोबारा दूध नहीं बन सकता।

दुख तो यह है कि शाह जी कि वे लोग भी इस्तीफा दे देते हैं जिन्हें इस्तीफा लिखना भी नहीं आता। कलम कागज संभाले खड़े हैं कि भैया जरा लिख देना। जब हमारे अलीबाबा ही जा रहे हैं तो हम चालीस चोर रह कर क्या करेंगे? और सच पूछो भैया तो हमें न ससुरा शपथ का अर्थ मालूम न इस्तीफे का। इतना ही पढ़े-लिखे होते तो कोई ढंग का काम न करते।

इस्तीफा उर्दू का लफ्ज है, मगर दिया हमेशा हिंदी या अंग्रेजी में जाता है। पेपर में छपा- उन्होंने दे दिया इस्तीफा, देश हित में। अगले दिन छपा कि वापस ले लिया, देशहित में। देशहित न हुआ तवायफ का गजरा हो गया कि हर शाम पहन लिया, हर सुबह उतार दिया। कुछ इस्तीफेबाज तो इतने जल्दबाज होते हैं कि इस्तीफा देकर कपड़े भी नहीं धुलवाते और उन्हीं कपड़ों में फिर शपथ की लाइन में लग लेते हैं।

देखा-देखी मेरे मित्र पं. मनसा राम को भी खुजली सवार हुई। पत्नी से बोले- ‘क्यों जी, मैं तुम्हें दे दूं इस्तीफा?’ पत्नी भड़क कर शोला हो गई। बोलीं- ‘तुम मुझे इस्तीफा दोगे? मेरे चरित्र पर लांछन लगाओगे? मैं यहां छ: पार्टियां बदल कर आई हूं क्या? यह घर है राजनीति नहीं कि शपथ बाप खाए और फायदा बेटा उठाए।’

कुल मिलाकर ऐ शाह जी, इस देश के एक अरब (से भी ज्यादा) कीड़े-मकोड़े इन्हीं शपथ और इस्तीफों का कागज चाट-चाट कर और 90 रुपए किलो की अरहर की दाल पी-पीकर जिन्दा हैं। एक उम्मीद पर कि कल फिर शपथ रूपी मम्मी आएगी, नए खिलौने लाएगी। इतिश्री इस्तीफाय नम:।

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