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शहर में सावन

दिल्ली में इस साल बारिश कम हुई, लेकिन जिस दिन कई दिनों के इंतजार के बाद जोरदार बारिश हुई, उस दिन सड़कों पर पानी भर गया और नतीजा दूर-दूर तक ट्रैफिक जाम। जिस शहर में एक साल बाद राष्ट्रमंडल खेल होने हैं, उसके लिए ऐसा होना अच्छा संकेत नहीं है। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की इमारत में भी बारिश का पानी घुसा और उड़ानों की व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। अगर दो-तीन घंटे कायदे से बारिश हो जाए तो दिल्ली की स्थिति यही हो जाती है।

हमारी आर्थिक राजधानी मुंबई में तो बाढ़ हर साल का नियमित कार्यक्रम बन चुकी है, और ध्यान देने लायक बात यह है कि बाढ़ पहले जितनी बड़ी होती थी, अब उससे ज्यादा बड़ी होती है। इसका मतलब यही है कि दिल्ली या मुंबई में जो कुछ विकास हुआ है, उसमें शहरी नियोजन और विकास के बुनियादी नियमों का ख्याल नहीं रखा गया है। यही हालत उस बेंगलूरु की है, जो आईटी क्षेत्र का इतना बड़ा गढ़ है कि अमेरिका में वह एक मुहावरा बन गया है। इस गढ़ में अमेरिकी तो सेंध शायद न लगा पाए लेकिन हमारे अपने ही नीति-निर्माता और आयोजनाकार इसकी नींव कमजोर करने में लगे हैं। ऐसी ही हालत कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों और देश के तेजी से विकसित होते दूसरे शहरों की है।

सार्वजनिक जरूरत के बुनियादी ढांचे को विकसित करने में ये सारे शहर पीछे छूटते चले ज रहे हैं। आर्थिक विकास की वजह से शहरों में जमीन की बढ़ती कीमत का फायदा उठाने के लिए तमाम सरकारें औने-पौने दामों पर आवासीय, औद्योगिक या व्यापारिक उद्देश्यों के लिए जमीनें बेच रही हैं और मॉल या बहुमंजिली इमारतें बनाते समय इस बात का ख्याल नहीं रखतीं कि इससे जो भीड़ बढ़ेगी उसके लिए सड़कें हैं या नहीं। बिजली, पानी की अतिरिक्त जरूरत का इंतजम कैसे होगा?
बारिश में पानी का भराव और बाढ़ जैसी चीजों पर तो सोचा ही नहीं जाता, इसीलिए थोड़ी सी बारिश दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों की गति ठप कर देती है। जमीन सिर्फ इमारतें बनाने के लिए नहीं है और पानी के रुकने और बहने के अपने नियम हैं, जिनकी अनदेखी भीषण परिणाम ला देती है, ऐसे विचार जब तक नीति-निर्माताओं के दिमाग में नहीं आएंगे, तब तक हमारे शहर और असुरक्षित होते जएंगे। राष्ट्रमंडल खेलों के वक्त शायद बारिश न हो और दिल्ली सरकार को शर्मसार न होना पड़े, लेकिन हमें तो इन्हीं शहरों में रहना है।

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