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जिंदगी का सबकुछ लूट गई एक दीवार

रात में खाना खाकर बस लेटे ही थे कि अचानक चारों ओर मौत का सन्नाटा छा गया। झुग्गियों पर तीस फिट ऊंची दीवार क्या गिरी कि न जाने कितने परिवार उसमें दबकर रह गए। घुप्प अंधेरा व कीचड़ से सराबोर सड़क के बीच बचने का कोई रास्ता नहीं था। कितनी ही सांसे उस भयानक मंजर में घंटों जिंदगी व मौत के बीच जूझती रहीं। रह-रहकर यह एहसास हो रहा था कि गले में अटकी सांस अब निकली कि तब निकली। यह व्यथा उन घायलों की जिन्होंने सोमवार की रात करीब तीस फिट ऊंची दीवार अपनी झुग्गियों पर गिर जने मौत की आहट बड़े पास से सुनी थी।


दीवार के नीचे दबे हुए पुरुष अपने बच्चे व महिलाओं को बचाने में बेबस थे। क्योंकि वे खुद उस मलबे में दबे हुए थे। किसी की सांस मौके पर ही थम गई, तो कोई अपनी सांसों को किसी न किसी तरह रोके हुए था। घायलों ने बताया कि रात करीब साढ़े आठ बजे जब दीवार हमारी झुग्गियों पर गिरी तो हम अपने-अपने परिवार के साथ थे। कोई अपने बच्चे को खिला रहा था तो कोई खाना पकाने के लिए चूल्हा जला रहा था, जबकि कोई खाना खाकर आराम कर रहे थे। तभी तीस फिट की दीवार गिरने से चारों ओर चीख पुकार मच गई। सभी अपने-अपने बच्चों व महिलाओं को बचाने के लिए दौड़े।


इनमें से कई लोग ऐसे भी थे, जो दीवार के नीचे दबकर इतने लाचार हो गए थे कि वे चाहकर भी अपने परिजनों को बचा न सके। इतना कहते ही घायलों की आंखों से आंसू झलक आए। उन्होंेने बिलखते हुए बताया कि देखते ही देखते परिवार के कई सदस्य उनकी आंखोंे के सामने ही खत्म हो गए और वे कुछ नहीं कर सके। जहां एक ओर उनकी आंखों में अपनों को खोने का दुख था वहीं दूसरी ओर घटना के जिम्मेदार लोगों पर गुस्सा भी था। वे अस्पताल में अपने आप को लाचार महसूस कर रहे थे। मौत के उस मंजर को याद कर वे बीच-बीच में सहम उठते हैं।

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