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जमाना टीवी, शॉपिंग का

जमाना टीवी, शॉपिंग का

बाजार से इनसान का रिश्ता लगभग उतना ही पुराना है, जितना भूख से इनसान का रिश्ता। सदियों से बाजार इनसान की जरूरत की चीजें इनसान को पहुंचाने का काम करता रहा है, लेकिन पिछले डेढ़-दो दशकों में भारत में बाजार के स्वरूप में काफी तेजी से बदलाव हुआ है। इसी का परिणाम है कि शॉपिंग अब इनसान की जीवनशैली का एक जरूरी हिस्सा बन गई है। साप्ताहिक बाजारों के साथ-साथ बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों तक में अब बड़े और भव्य शॉपिंग मॉल नजर आने लगे हैं, जहां खरीदारी की चीजों के साथ ही मनोरंजन का भी सारा सामान उपलब्ध होता है। बेशक यहां चीजें तुलनात्मक रूप से महंगी होती हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय मध्यवर्ग को मॉल की अवधारणा पसंद आयी है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि मॉल में खरीदारी के आंकड़े कभी भी बहुत सकारात्मक नहीं रहे। लोग वहां जाते तो हैं, लेकिन शॉपिंग उनकी प्राथमिकता नहीं होती। वहां वे तफरीह के लिए जाना ज्यादा पसंद करते हैं।

वैसे शॉपिंग का एक खास फंडा यह है कि इसके लिए इनसान को तैयार होकर बाजार तक जाना पड़ता था। बाजार इस पर लगातार सोच रहा था। वह सोच रहा था कि किस तरह इनसान के बेडरूम तक पहुंचा जाए, यानी किस तरह व्यक्ति अपने घर से बाहर निकले बगैर ही शॉपिंग कर सके। और इस अवधारणा को अमली जामा पहनाया टेलिफोन और इंटरनेट ने। इनके आने से शुरू हुआ टेली-शॉपिंग और ऑनलाइन शॉपिंग का सिलसिला। अब लोगों के लिए यह जरूरी नहीं रह गया कि वे शॉपिंग करने के लिए तैयार होकर बाहर जाएं। अब वे टेलीफोन पर या ऑनलाइन ही चीजों का ऑर्डर करने लगे। पर इसमें एक दिक्कत आई और अब भी आ रही है। इस तरह की शॉपिंग में माल बेचने वाला और माल दोनों अदृश्य थे। तो उपभोक्ता इस तरह की शॉपिंग पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं कर पाये। एक दिक्कत यह भी थी कि आज भी बड़ी संख्या में भारतीय जनसंख्या नेट सेवी नहीं है। तो शॉपिंग की यह अवधारणाएं भी, चलते रहने के बावजूद बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाईं। इस बीच टेलीविजन की पहुंच बेहद बढ़ चुकी थी। लगभग हर घर में टीवी पहुंच चुका था। और आम दर्शक टीवी पर भरोसा करने लगा था। तो बाजार ने इसी टेलीविजन के जरिये लोगों के घर तक पहुंचने की सोची और बाजार में एक नयी अवधारणा आई-टीवी शॉपिंग।

इसके मूल में यही था कि व्यक्ति जब चाहे शॉपिंग कर सके। टीवी शॉपिंग की इसी अवधारणा ने लगभग 14 माह पहले होम शॉप-18 नामक 24 घंटे के चैनल को जन्म दिया। इसमें तमाम तरह के उत्पादों को लेकर इनोवेटिव किस्म के प्रोग्राम बनाये गये, ताकि उपभोक्ताओं को उत्पादों के बारे में महीन से महीन जानकारी दी जा सके। होम शॉप-18 के मुख्य कार्यकारी संदीप मल्होत्रा कहते हैं, ‘हमारा मकसद था लोगों में शॉपिंग की हैबिट विकसित करना और उन्हें सिखाना कि आत्मविश्वास के साथ शॉपिंग कैसे की जा सकती है।’ वह बताते हैं कि चैनल शुरू करते समय हमारे जेहन में यही था कि हमारे पास छोटे शहरों से ज्यादा ऑर्डर आएंगे, क्योंकि वहां ब्रांडेड प्रोडक्ट्स की उपलब्धता नहीं होती, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से हमारे पास तमाम बड़े शहरों से ऑर्डर आ रहे हैं।

टीवी शॉपिंग का क्रेज भारत में कितनी तेजी से फैल रहा है, इसका अंदाजा होम शॉप-18 द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों से लगाया जा सकता है। जब यह चैनल शुरू हुआ तो इसकी प्रतिदिन सेल पांच लाख रुपए थी, जो आज बढ़ कर एक करोड़ रुपए प्रतिदिन हो गयी है। पहले इसके पास पांच सौ कॉल प्रतिदिन आती थीं, आज 20 हजार कॉल प्रतिदिन आ रही हैं। पहले इनके पास महज पांच ब्रांडेड आयटम थे, आज 19 हजार ब्रांडेड आयटम हैं। पहले भारत के 450 शहरों के लोग टीवी के जरिये शॉपिंग कर रहे थे, आज 2700 शहरों के लोग टीवी शॉपिंग में रुचि ले रहे हैं। यानी टीवी शॉपिंग में लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है। सवाल उठता है क्यों? संदीप मल्होत्रा इसके ये कारण बताते हैं : हम मैन्यूफैक्चरर से प्रोडक्ट लेकर सीधा ग्राहकों तक पहुंचाते हैं, यानी मैन्यूफैक्चरर और उपभोक्ता के बीच के सारे मिडिलमैन खत्म। इससे उपभोक्ताओं को सस्ता माल मिलता है। दूसरा कारण, टीवी ही एकमात्र ऐसा जरिया है, जहां ग्राहक खरीदे जाने वाले प्रोडक्ट का डेमोन्स्ट्रेशन देख सकते हैं। हम अपने शोज में हर प्रोडक्ट के सारे फीचर बताते हैं, जो सामान्य शॉपकीपर तक नहीं बताते। और तो और, इस टीवी शॉपिंग ने पहली बार यह संभव कर दिखाया है कि महिलाएं टीवी पर देख कर ज्वेलरी खरीद रही हैं।  अगर होम शॉप-18 के दावों और आंकड़ों को सही माना जाए तो कहा जा सकता है कि भविष्य टीवी शॉपिंग का है। इसकी खास वजह यह है कि टीवी के जरिये बाजार आपके अपने घर में घुस आया है, आप जब चाहें यहां से सामान खरीद सकते हैं।

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