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रिजर्व बैंक की प्रमुख नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं

रिजर्व बैंक की प्रमुख नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं

भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी तिमाही समीक्षा में नीतिगत दरें अपरिवर्तित रखीं और कहा कि आर्थिक हालात में सुधार के संकेत हैं पर केंद्रीय बैंक ने बढ़ते राजकोषीय घाटे को लेकर आगाह किया है।

आरबीआई ने चेतावनी दी कि राजकोषीय पुनर्गठन की चुनौती है जिसके कारण हालात में अनिश्चितता बनी रहेगी। मौद्रिक नीति की तिमाही समीखा में रिजर्व बैंक ने अपनी रेपो और रिवर्स रेपो दरों को अपरिवर्तित रखा। रेपो वह दर है जिस पर बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देत है। रिवर्स रेपो दर पर आरबीआई बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी को अपने पास समेटता है।

केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष के दौरान छह फीसदी की आर्थिक वृद्धि दर रहने का अनुमान जाहिर किया जिसमें बढ़ोतरी की संभावना है।

बैंकरों की उम्मीद के अनुरूप आई मौद्रिक नीति में हालांकि कहा गया है कि खाद्य भंडार में बढ़ोतरी, औद्योगिक उत्पादन की सकारात्मकता और कारोबारी भरोसा बढ़ाने के कारण आर्थिक हालात में सुधार के संकेत दिख रहे हैं।

हालांकि नीति में कहा गया है कि मॉनसून में देरी और कमी, खाद्य पदार्थों की मंहगाई, वैश्विक कीमतों में फिर से आई तेजी, कमजोर मांग और उच्च राजकोषीयो घाटे जैसे कुछ नकारात्मक संकेत भी हैं।
 
आरबीआई को उम्मीद है कि मुद्रास्फीति मार्च 2010 तक बढ़कर पांच फीसदी के करीब पहुंच जाएगी।

आरबीआई ने कहा कि संतुलन की बात यह है कि 2009-10 के वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद और मुद्रास्फीति में मौजूदा अनुमान के मुकाबले वृद्धि की संभावना है।

केंद्रीय बैंक ने बैंक दर -जिस दर पर बैंक आरबीआई से लंबे समय के लिए ऋण लेते हैं- छह फीसदी पर अपरिवर्तित रही। आरबीआई ने रेपो दर और रिवर्स रेपो को क्रमश: 4.75 फीसदी और 3.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखी है। तिमही नीति में नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) भी पांच फीसदी पर अपरिवर्तित रखा गया है।

आरबीआई के गवर्नर डॉ. डी सुब्बाराव द्वारा बैंकों के प्रमुखों के साथ बैठक में प्रस्तुत तिमाही नीतिगत समीक्षा में सरकार के भारी भरकम राजकोषीयो घाटे को लेकर आगाह किया गया है कि यदि यह आर्थिक हालात में सुधार की अवधि के बाद भी जारी रहता है तो निजी निवेश में कमी आ सकती है और मुद्रास्फीति के दबाव बढ़ा सकता है।

केंद्रीय बैंक ने सरकार को राजकोषीय संतुलन की ओर पुन: लौटने की जरूरत पर बल दिया है। सरकार ने राजकोषीयो घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 6.8 फीसदी रहने का अनुमान जाहिर किया है जिसके कारण सरकार को 2009-10 में बाजार से 4.50 लाख रुपए से अधिक का ऋण लेना पड़ सकता है।

केंद्रीय बैंक ने कहा कि सरकार को राजकोषीय पुनर्गठन के मार्ग पर वापस लौटने की जरूरत होगी। आरबीआई ने कहा इसके लिए मात्रात्मक लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हुए वित्तीय समायोजन की गुणवत्ता के लिए खाका तैयार करने की जरूरत होगी।

आरबीआई ने कहा कि दूसरी चुनौती 2009-10 के लिए सरकार के उधारी कार्यक्रम का प्रबंधन करना है। केंद्रीय बैंक नीतिगत दरों को व्यवस्थित और नकदी की स्थिति को सुकूनदेह बनाकर निजी ऋण की बढ़ती मांग की चुनौती से निपटेगा।

मुद्रास्फीति के बारे में सर्वोच्च बैंक ने कहा कि शून्य से नीचे के स्तर पर चल रही मुद्रास्फीति का दौर कुछ ही महीनों तक रहेगा। आरबीआई ने कहा कि मॉनसून की अनिश्चितता और वैश्विक स्तर पर जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण मार्च 2010 तक मुद्रास्फीति करीब पांच फीसदी के स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। यह वार्षिक ऋण नीति में जाहिर चार फीसदी के अनुमान से अधिक है।
 
मौद्रिक नीति का प्रयास यह होना चाहिए कि मूल्य की स्थिरता सुनिश्चित करे ताकि मुद्रास्फीति को चार से 4.5 फीसदी के बीच रखा जा सके और मध्यावधि लक्ष्य तीन फीसदी का हो।

 

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