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समलैंगिकता: बदल जाएगा परिवार का स्वरूप

समलैंगिकता पर उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय से सहमत है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड विधान की धारा-377 के उस अंश को असंवैधानिक करार दिया था, जिसमें समलैंगिकता को अपराध माना गया है। इसमें निजता के अधिकार और व्यक्गित आजादी का हवाला देते हुए कहा गया है कि आपसी सहमति से ऐसा करना अपराध नहीं है। इस लिहाज से वेश्यावृत्ति भी अपराध नहीं है, जो दो वयस्कों के बीच रजामंदी से बनाया गया संबंध है। अवैध व्यापार (ट्राफिक) निरोधक अधिनियम के तहत यदि कोई औरत स्वेच्छा से सेक्स को जीविकोपार्जन का ज़रिया बनाती है तो वह अपराध नहीं है। यह अपराध तब बनता है, जब किसी सार्वजनिक स्थल, जैसे शिक्षण संस्थान, पूजा स्थल आदि के निकट कोई वेश्या ग्राहक ढूंढे या किसी दलाल की संलिप्तता से सेक्स का कारोबार चलाया जाए, क्योंकि तब माना जाता है कि दलाल अपने लाभ के लिए लड़कियों का इस्तेमाल करता है, जिसमें शोषण अन्तर्निहित है। किंतु यह सही है कि दो वयस्कों के बीच यदि सहमति काहोना ही पर्याप्त है तो कई अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना होगा। इस तर्क से इनसेस्ट या परस्त्रीगमन (एडल्टरी) को भीअपराध नहीं माना जाना चाहिए। कई देशों में यह सब वैध भी है। परस्त्रीगमन भारतीय दण्ड विधान की धारा-497 के तहत जुर्म है, जिसमें पुरुष को तो दण्डित किया जाता है, लेकिन स्त्री को नहीं, क्योंकि विक्टोरियाई युग की मान्यता के अनुसार पत्नी का कोई स्वतंत्र निर्णय नहींहोता, परंतु पुरुष अपराधी है, क्योंकि उसने किसी अन्य पुरुष की सम्पति के साथ छेड़-छाड़ की है। ऐसा संबंध सहमति के आधार पर बनते हैं, दबाव के तहत नहीं, अन्यथा वह बलात्कार होगा। उच्चतम न्यायालय ने 1965 में मोहम्मद याकूब के मामले में इस व्याख्या को इस आधार पर उचित ठहराया कि पूरी सामाजिक व्यवस्था औरतों के खिलाफ है। यदि कोई औरत पति के अलावा किसी अन्य से शारीरिक सम्पर्क बनाती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह दाम्पत्य जीवन से बेहद असंतुष्ट है, इसलिए अदालत की नज़र में उसे अपराधी बनाना सही नहीं होगा। लेकिन सहमति के आधार पर बने लैंगिक संबंध को अपराध क्यों माना जाए? तलाक के लिए तो यह आधार हो सकता है, इसे अपराध मानने का क्या औचित्य है?

दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को मानवाधिकार की ऐसी जीत बताया जा रहा है जिससे लगता है कि मानवाधिकार का कोई भयंकर उल्लंघन हो रहा था, जिससे बहुसंख्यक जनता पीड़ित थी, जिसे अदालत ने त्राण दिया है। इसमें निजता के अधिकार की बात कही गयी है। यह सही है कि निजता का अधिकार भारतीय परंपरा में शुरू से रहा है, जबकि माना जाता है कि पूरे विश्व में 1890 में हारवार्ड लॉ रिव्यू में चार्ल्स वारेन और लूई ब्रैंडाइस का लेख ‘द राइट टू प्राइवेसी’ प्रकाशित होने के बाद इस अधिकार को मान्यता मिली। पर्सी एच़ विनफील्ड ने 1931 में हाउस ऑफ कॉमन में भारतीय मामलों का हवाला देकर ब्रिटिश नागरिकों के लिए निजता के अधिकार की मांग की।  प्रो़ एलेन एफ़  वेस्टिन ने लिखा है कि निजता की जरूरत चार कारणों से होती है- व्यक्तिगत स्वायतता, भावनात्मक मुक्ति, आत्ममूल्यांकन तथा सीमित और सुरक्षित संवाद। व्यक्ति की स्वायतता को सबसे बड़ा खतरा इस सम्भावना से है कि कोई अन्य उसकी निजी जिंदगी में प्रवेश कर उसके छिपे रहस्य को जान ले। इस स्वायतता की रक्षा निजता से होती है, जो किसी के व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। भावनात्मक
मुक्ति के लिए यह जरूरी है, क्योंकि कई बार व्यक्ति दुनिया के शोरगुल से दूर अकेला होना चाहता है, ताकि वह अपना ‘स्वयं’ हो सके। आत्म-मूल्यांकन के लिए यह अनिवार्य है, जब मनुष्य अपने कायरें एवं आचरण के नैतिक पहलुओं पर विचार करता है। सीमित संवाद कई बार दूसरों के साथ भी होता है। जैसे वकील, डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक आदि, या चर्च में पुजारी के समक्ष पाप की स्वीकृति। अब निजता के अधिकार का इस्तेमाल एकांत में वैसे लैंगिक संबंधों को बनाने के लिए किया जाए जो पारंपरिक रूप से निषिद्ध हैं तो यह इस अधिकार की सही व्याख्या नहीं होगी। समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का एक लाभ अवश्य मिलेगा कि पुलिस समलैंगिकों काभयादोहन कर हफ्ता नहीं वसूल पाएगी। परंतु यह पहला चरण है। दूसरा चरण है इसकी कानूनी मान्यता। ऐसा होने पर उन्हें कई अधिकार मिल जाते हैं, जैसे समलैंगिक दम्पति भी बच्चे गोद ले सकेंगे। और तीसरा चरण है विवाह। दुनिया में कई जगह यह अधिकार मिला भी हुआ है लेकिन अगर यहां ऐसा हुआ तो परिवार और समाज का स्वरूप बदल जाएगा।


sudhanshuranjan@hotmail.com

लेखक टेलीविजन के पत्रकार हैं

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