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अहमद अली खाँ

अहमद अली खाँ नक्शबन्दिया सूफी सिलसिले के मानने वाले थे। धर्मशास्त्र से संबंधित तथ्यों की व्याख्या करने में इनको निपुणता प्राप्त थी। कुरआन शरीफ को शुद्ध उच्चरण के साथ पढ़ने की कला में वे पूर्ण दक्ष थे। उन्होंने दो दीवान (कविताओं का संग्रह), एक काव्य ग्रंथ ‘महारबा काबुल’ और ‘फतावाए अहमदी’ लिखा है। आप धर्म पालन में अत्यंत दृढ़ थे। वे सुन्नत (वह काम जो हजरत मोहम्मद पैगम्बर ने किया हो) के पाबंद थे। उनका मानना था कि सुन्नत का अनुकरण करने से मनुष्य ईश्वर का प्रेम पात्र हो जाता है। 1304 हिजरी में वे सरहिन्दी शरीफ गए और वहां सूफी इमाम रब्बानी से सूफी मत की तालीम हासिल की। आपने सूफी मुजद्दिद अल्फसानी के हालात के बारे में किताब ‘तोहफतुल मुजद्दिदैन’ लिखी। अहमद अली खाँ साहब एक रिसालदार के यहां नौकर थे। एक दिन एक रईस जो लोगों को ब्याज पर रुपए उधार देता था, उसने अपने भतीजे की तालीम (शिक्षा) के लिए उन्हें बुलाया। अहमद अली खाँ ने शिक्षा देना शुरू कर दिया। यह काम रिसालदार को बहुत ही बुरा लगा। एक दिन रास्ते में साथ जाते समय रिसालदार ने अहमद अली खाँ से कहा कि आप एक सूदखोर का दिया खाते हैं। और फिर सतगुरु होने का दावा करते हैं। यह बड़ी शर्म की बात है। यह सुनकर अहमद अली खाँ ने रिसालदार से कहा कि आपको शायद मालूम नहीं कि जिस दिन से मैंने उस रईस सूदखोर के भतीजे को तालीम देना शुरू किया है, उसी दिन से उस पर ऐसा असर हुआ कि उसका यह ऐब (दुगरुण) दूर हो गया और उसने सूदखोरी का काम ही छोड़ दिया है।
अहमद अली खाँ साहब ने नौ रबीउल अव्वल 1307 हिजरी को अपना शरीर त्याग दिया। आपका मजार शरीफ, कायमगंज, जिला फरुख़ाबाद में है, जहां आज तक हर वर्ष उर्स का मेला लगता है। आपकी गिनती मुल्क के ही नहीं दुनिया के बड़े सूफियों में होती है।

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