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उत्सजर्न की सीमाएं

पर्यावरण और वनमंत्री जयराम रमेश इन दिनों पश्चिमी मीडिया में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलरी क्लिंटन से कार्बन उत्सजर्न के मामले पर हुई बातचीत के बाद उनकी पश्चिमी मीडिया में पर्याप्त आलोचना हो रही है। अब उन्होंने बयान दिया है कि भारत कार्बन उत्सजर्न के मामले में किसी कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि पर दस्तखत नहीं करेगा। इससे रमेश की आलोचना बढ़ेगी, लेकिन कोपेनहेगेन बैठक में क्या माहौल रहेगा, यह भी तय हो गया है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार संधि की तरह ही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सजर्न के मामले में भी विकसित और विकासशील देशों के दो खेमे बंट गए हैं और विवाद का मुद्दा भी लगभग समान ही है। विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश ज्यादा त्याग करें और विकासशील देशों का कहना है कि उनके ज्यादा त्याग करने का अर्थ विकास की संभावनाएं धूमिल करना है, चूंकि विकसित देश पहले ही बेहतर स्थिति में हैं, इसलिए वे ज्यादा त्याग करें तो ज्यादा नुकसान में नहीं रहेंगे। कार्बन उत्सजर्न के मामले में ओबामा प्रशासन कुछ ज्यादा गंभीर है।

कई तेल कंपनियों से मधुर रिश्ते रखते रहे राष्ट्रपति बुश के लिए पर्यावरण के मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। हिलरी क्लिंटन की भारत यात्रा का एक मुख्य उद्देश्य भारत को इस मुद्दे पर राजी करना या कम से कम टोह लेना था। लेकिन रमेश के वक्तव्य से साफ है कि भारत झुकने को तैयार नहीं है। हिलरी ने भारत के सामने यह तर्क रखा कि गरीबी हटाने के ऐसे तरीके हो सकते हैं, जिनमें कार्बन उत्सजर्न कम हो। तर्क के स्तर पर भारतीय इस बात से सहमत होंगे, लेकिन भारत का तर्क यह है कि पश्चिमी देश बेहतर टेक्नोलॉजी उपलब्ध करवाने में विकासशील देशों की मदद करें, जबकि यथार्थ यह है कि वे अपने यहां की पुरानी टेक्नोलॉजी विकासशील देशों में खपाते हैं। दूसरी बात यह है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सजर्न के मामले में भारत जैसे देश पश्चिमी देशों से बहुत पीछे हैं, इसलिए ज्यादा बड़े कदम उन्हें उठाने चाहिए। पश्चिमी देशों का तर्क यह है कि चूंकि आबादी विकासशील देशों की ज्यादा है इसलिए प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सजर्न कम होते हुए भी कुल उत्सजर्न में उनका अंश बहुत बड़ा है। विकसित देशों की समस्या यह है कि अपनी कुल जीवनशली उन्होंने ऐसी बनारखी है कि वह ज्यादा से ज्यादा उपभोग पर आश्रित हैं और उसमें कटौती करना उन्हें मुश्किल नजर आ रहा है। इसलिए मुद्दा जयराम रमेश की लोकप्रियता का नहीं है, ज्यादा व्यापक है। मुद्दा है प्राकृतिक साधनों को किफायत से बरतने का और इस मामले में तो भारत के गरीब पश्चिमी देशों को काफी कुछ सिखा सकते हैं।

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