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थम नहीं रहा हिन्दी अकादमी में मचा घमासान

थम नहीं रहा हिन्दी अकादमी में मचा घमासान

हास्य कवि अशोक चक्रधर को हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने के विरोध में अकादमी के सचिव ज्योतिष जोशी के इस्तीफे के बाद भी विवाद थम नहीं रहा है। राजधानी में लेखकों का ध्रुवीकरण हो गया है और वे चक्रधर के समर्थन और विरोध में बंट गए हैं।

हिन्दी अकादमी की संचालन समिति के सदस्य एवं प्रसिद्ध आलोचक डा. नित्यानंद तिवारी ने भी इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे की चिट्ठी सोमवार को अकादमी की पदेन अध्यक्ष एवं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सौंप दी है। रविवार को हिन्दी के 124 लेखकों ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को एक ज्ञापन देकर चक्रधर का समर्थन किया था।

इस बीच जनवादी लेखक संघ (जलेस) के महासचिव डा. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने अकादमी को स्वायत्त कर उसे राजनीतिज्ञों और नौकरशाही के नियंत्रण से मुक्त करने की मांग की है। डा. सिंह ने बताया कि वह इस संबंध में रविवार को जलेस की बैठक बुलाने जा रहे हैं और इस समस्या पर विचार विमर्श करने के बाद शीला दीक्षित को हम एक चिट्ठी लिखेंगे और लेखकों का एक प्रतिनिधिमंडल भी इस संबंध में उनसे मिलना चाहेगा।

डा. सिंह का कहना है कि हिन्दी अकादमी गुटबाजी और पुरस्कारों की राजनीति का भी शिकार हो गई है। सूत्रों के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय के दो अवकाशप्राप्त हिन्दी प्रोफेसरों के बीच कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान देने को लेकर मतभेद के कारण भी यह संकट उत्पन्न हुआ है। ये दोनों प्रोफेसर अशोक चक्रधर के गुरु रहे हैं पर चक्रधर को लेकर दोनों के बीच मतभेद हैं। सूत्रों का कहना है कि साहित्य अकादमी के अनुवाद पुरस्कार को लेकर भी इन दोनों के बीच संबंध तनावूपर्ण हो गए थे। गौरतलब है कि पिछली संचालन समिति ने वैद को श्लाका सम्मान देने का फैसला लिया था। पर वह स्थगित हो गया है।

इस बीच हिन्दी के कवि नीलाभ अश्क ने अर्चना वर्मा के इस्तीफे पर आश्चर्य व्यक्त किया है। उनका कहना है कि अर्चना वर्मा को जनार्दन द्विवेदी जैसे राजनीतिज्ञ को उपाध्यक्ष बनाए जाने पर क्यों आपत्ति नहीं हुई थी। नीलाभ अश्क, कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी और अर्चना वर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एमए में हिन्दी के छात्र थे और तीनों ने एक ही वर्ष एमए पास किया था।

डा. तिवारी ने कहा कि आने वाले दिनों में अभी और सदस्य भी अकादमी से इस्तीफा देंगे। सूत्रों का कहना है कि दिल्ली के नौकरशाहों ने अकादमी के पुरस्कारों की संख्या घटाकर पांच करने का निर्देश दिया है। इस पर भी लेखकों को आपत्ति है। पहले 11 लेखकों को साहित्यकार सम्मान दिए जाते थे। इसके अलावा 10-12 पुरस्कार पुस्तकों पर भी दिए जाते थे।

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