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टेक्नोलॉजी फ्यूचर दस बदलाव बदल देंगे जिंदगी

तकनीक तेज रफ्तार से बदल रही है। इसके भावी स्वरूप की कल्पना या तो विज्ञान कथाओं में पढ़ने को मिलती है या फिर फिल्मों में दिखती है। गत दो दशकों में तकनीकी के क्षेत्र में जबर्दस्त बदलाव देखने को मिले हैं, जिन्होंने रोजमर्रा के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिए हैं। ऐसे ही प्रमुख 10 शोधों पर नजर डाल रहे हैं अनुराग मिश्र

सेंसीटाइजिंग मशीन
कंप्यूटर द्वारा संवाद करने के तरीके जैसे कि वॉयस कमांड, टैक्स्ट टू स्पीच सॉफ्टवेयर आदि से हम पूरी तरह वाकिफ हैं। विज्ञान की कल्पनाओं में अकसर कंप्यूटर को मनुष्य की तरह दर्शाया जाता है। उन कहानियों में कंप्यूटर लोगों की तरह बातचीत करता है, उसमें सुख-दु:ख के भाव होते हैं। अब जल्द ही ऐसी कल्पना साकार होने वाली है। बेलफास्ट की क्वीन यूनिवíसटी, जर्मन सेंटर फॉर रिसर्च ऑन आíटफिशियल इंटेलीजेंस, पेरिस यूनिवíसटी की टीम ने आíटफिशियल लिस्नर सिस्टम (एसएएल) नामक मशीन बनाने की शुरुआत की है। यही नहीं, यह मशीन मनुष्यों की तरह अपनी आवाज, व्यवहार में बदलाव भी कर सकेगी। इसके निर्माण में मनोविज्ञान, भाषा और समाजविज्ञान के सिद्धांतों को ध्यान में रखा गया है।

वाइट्रीसिटी
अगर आपसे यह कहा जाए, कि आप बिजली का इस्तेमाल भी वाई-फाई तकनीक की तरह कर सकेंगे, तो आपको शायद विश्वास न हो, लेकिन अब ये कल्पना जल्द ही साकार रूप लेनी वाली है। एमआईटी (मैसाचुसेट्स इंस्टीटच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) के सहायक प्रोफेसर मेरिन सालजेकिक ने बिना तारों के बिजली ट्रांसमिट करने की तकनीक ईजद की है। सालजेकिक ने अपने दो सहयोगियो जॉन होनोपोलस और पीटर फिशर की मदद से दो मीटर दूर लगे 60 वाट के बल्ब को जला सकने में सफलता हासिल की। अगर आने वाले समय में यह तकनीक कामयाब हो जती है, तो फोन, माउस और की-बोर्ड की तरह बिजली भी वायरलैस हो जाएगी। यानी भविष्य में आपको कंप्यूटर चलाने के लिए स्विच को सॉकेट में लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

रेसट्रैक मेमोरी
आईबीएम के शोधकर्ता स्टुअर्ट पाíकन ने नए तरह का डाटा स्टोरेज विकसित किया है जो कंप्यूटिंग क्षेत्र को बदल कर रख देगा। अगर यह सफल रहा तो यह मेमोरी हर तरह की मेमोरी की जगह ले लेगी और इससे छोटे कंप्यूटरों, आईपॉड व अन्य पोर्टेबल डिवाइसों के लिए बेहद सस्ती मेमोरी तैयार करना आसान हो जएगा। रेसट्रैक मेमोरी डाटा को वíटकल नैनोवायर में एकत्र करेगी। इसका फायदा यह होगा कि इसी आकार के फ्लैश चिप ट्रांजिस्टर की तुलना में ये सौ गुना ज्यादा डाटा एकत्र कर पाएगी। चूंकि इसमें मैकेनिकल पार्ट की संख्या कम है, ऐसे में ये हार्डड्राइव की तुलना में ज्यादा विश्वसनीय होगी। रेसट्रेक मेमोरी की गति तेज होगी, जिसकी वजह से डीआरएएम की तरह स्पीड से डाटा एकत्रित कर पाएगी। यहां तक कि कंप्यूटर के बंद होने पर भी यह इन्फॉरमेशन को स्टोर करने में सक्षम होगी। अत: कंप्यूटरों का आकार छोटा और ऊर्जा के लिहाज से वह किफायती हो जाएंगे।

माइक्रो-एमपीथ्री
आज के दौर में आईपॉड और एमपीथ्री की दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी है। इनकी स्टोरेज क्षमता और फंक्शन भी तेजी से बढ़े हैं। रोस्टर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ऐसी तकनीक ईजाद की है जिसकी मदद से कंप्यूटर की स्टोरेज क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। इसकी मदद से आम एमपीथ्री फाइल एक हजार गुना छोटी हो जएगी। रोस्टर विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर मार्क बोको ने मिलकर इस तकनीक की खोज
की है।

इंटेलीजेंस सॉफ्टवेयर असिस्टेंट
सिलिकॉन वैली की कंपनी सीरी के सह-संस्थापक एडम चेयरे ने एक ऐसे सॉफ्टवेयर का डिजइन तैयार किया है जो हमारे लिए निजी सहायक की भूमिका निभाएगा। यह वर्चुअल पर्सनल असिस्टेंट सॉफ्टवेयर यूजर को रोजमर्रा के कार्यो जसे ट्रेन या प्लेन की बुकिंग करने और इंटरटेनमेंट को बेहतर तरीके से खोज पाने में मददगार साबित होगा। एडम चेयरे का कहना है कि इस सॉफ्टवेयर को एक टूल की तरह बनाया गया है, न कि मानव की बुद्धिमत्ता को चुनौती देने के लिए।

एंटी वायरस क्लस्टर
आपने क्लाउड कंप्यूटिंग के बारे में सुना होगा। अब तक कंप्यूटर में सॉफ्टवेयर की मदद से जो प्रोग्राम आप इंस्टाल करते हैं, अब उनकी आवश्यकता कतई नहीं होगी, क्योंकि ये सब सॉफ्टवेयर आपको वेब सेवाओं के जरिए मिल सकेंगे। वर्तमान में ऐसा कोई एंटीवायरस नहीं है जो किसी कंप्यूटर को शत-प्रतिशत सुरक्षा की गारंटी देता हो।

कितना बेहतर हो, अगर कंप्यूटर खोलते ही वेब पर आपके कंप्यूटर के फाइल और डाक्यूमेंट की पूरी तरह जांच हो। मिशिगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एंटीवायरस की क्लाउड आधारित एप्रोच को विकसित करना शुरू किया है जिसे ‘क्लाउड एवी’ नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह बाजार में किसी एंटीवायरस के मुकाबले बेहतर साबित होगा।

टेलीस्कोपिक पिक्सल
एलसीडी और प्लाज्मा बाजर में सीआरटी के बेहतर विकल्प के रूप में सामने आए थे। अब शोधकर्ता इसका विकल्प तलाशने में लगे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है बात चाहे प्लाज्मा की हो, एलसीडी या फिर सीआरटी की, हम शुरू से ही पिक्सल से जुड़े हुए हैं। ‘पिक्सल’ जो पिक्चर एलीमेंट का शॉर्ट फॉर्म है, में छोटी-छोटी डॉट्स होती हैं जो इमेज का निर्माण करती हैं। इमेज की क्वालिटी को स्क्रीन के रिजोल्यूशन के आधार पर परखा जता है। हालांकि एलसीडी स्क्रीन तकनीक कई मायनों में बेजोड़ है, लेकिन इसकी कई खामियां भी सामने आई हैं, जिसकी वजह से आज भी आप सुपर क्वालिटी इमेज नहीं देख पाते। एलसीडी स्क्रीन के पिक्सल पूरी तरह से कभी बंद नहीं होते। माइक्रोसॉफ्ट के शोधकर्ता ने पिक्सल की एक नई डिजइन बनाई है। ये पिक्सल ऊज्र की खपत कम करेंगे, साथ ही लैपटॉप और फोन की बैटरी लाइफ भी बढ़ जएगी। इसके अलावा, मौजूदा एलसीडी टेक्नोलॉजी की तुलना में आप कंप्यूटर की ब्राइटनैस 36 प्रतिशत बढ़ा सकेंगे।

मोबाइल चार्ज
कितना बेहतर रहे कि हमारे सेलफोन हमारी शर्ट से ही चार्ज हो जएं। सुनने में शायद यह अटपटा सा जरूर लगे, लेकिन ये हकीकत है। अकसर हम ऐसी समस्या से रूबरू होते हैं कि फोन की बैटरी खत्म हो गई और चाजर्र हमारे पास नहीं होता। अटलांटा की जॉíजया इंस्टीटच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जोंग लिन वांग नेजिंक ऑक्साइड की मदद से फैब्रिक बनाया है जो धारा उत्पन्न करने में सक्षम है। टेक्सास विश्वविद्यालय के एडम हेलर ने ईंधन कोशिकाएं बनाई हैं जिनको आर्टरी में इंप्लांट किया जाएगा, जो खून में ग्लूकोज की मात्रा का प्रयोग ईंधन के रूप में करेगी।

ऑर्गेनिक हार्डडिस्क
अगर प्रोटीन आपकी मेमोरी क्षमता को सुधार सकता है, तो फिर सीडी और डीवीडी की क्यों नहीं। शोध में ये बात सामने आई है कि बायोलॉजिकल पदार्थो से बनी मेमोरी आधारित डिवाइस इनफॉरमेशन को सिंथेटिक पदार्थो से बनी डिवाइस के मुकाबले कई गुना तेजी से प्रोसेस कर सकती है और ज्यादा डाटा स्टोर कर सकती है। सामान्यत: हमारी हार्ड डिस्क में मैग्नीटिक और ऑप्टिकल डाटा स्टोरेज सिस्टम होता है। इस क्षेत्र में जापान के शोधकर्ताओं ने बेहतर काम किया है। कोजी नाकायामा, मेजीमा और तकाशी शिकावा ने फ्लोरोसेंट प्रोटीन का प्रयोग कर एक हार्डडिस्क का निर्माण किया है, जिसकी स्टोरेज व प्रोसेसिंग क्षमता अन्य हार्डडिस्कों के मुकाबले हर मायने में बेहतर होगी।

स्पेसशिप
प्लेन से डूबता सूरज देखना आनंदायक अनुभव है, लेकिन इसे लांच करना शायद उतना आसान नहीं है। दो प्राइवेट कंपनियों गैलेक्टिक और एक्ससीओआर एयरोस्पेस ऐसा स्पेसक्राफ्ट विकसित करने में लगी हैं, जिसकी मदद से यात्रियों को अंतरिक्ष में भेज जाएगा। इसके लिए इन कंपनियों ने इसके विंग की संख्या में ईजफा कर दिया है, क्राफ्ट के वजन को कम किया गया है और तेल की खपत कम करने के उपाय किए गए हैं। उम्मीद है कि 2010 तक ये काम करने लगेंगे।

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