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दो टूक

शहीद यानी गवाह, साक्षी। देश की सीमाओं के निगहबान, गवाह हैं हमारी क्षेत्रीय अखंडता के। अगर कोई दुश्मन उसका उल्लंघन करता है तो वे चुनौती देते हैं, मारते-मरते हैं, पर उनकी मौत सड़क हादसे, रोमांच या रंजिश में हुई मौत से अलग होती है। वे शहीद होते हैं।

करगिल युद्ध के शहीद हों या आजादी के संग्राम के वीर, ऐसा क्यों हो गया है कि हम साल में एक निश्चित दिन ही उन्हें याद कर एक रस्म अदा कर देते हैं। क्या इस तरह आने वाली पीढ़ियों में देशभक्ति का जज्बा पैदा हो पाएगा? देशवासियों के वजूद, सुख-चैन की खातिर अपनी हस्ती को मिटा देने वाले शहीदों को याद रखना हमारा फर्ज है। आखिर, सैनिकों की मुस्तैदी से ही हम महफूज हैं।

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