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जबान गोया पैन इंडियन है..

यह कोई बड़ी खबर नहीं थी। तमिलनाडु के सिंगमपेत्ताई कस्बे के गवर्नमेंट हायर सेकंडरी स्कूल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. सदाशिवम का सम्मान किया गया। वे उस स्कूल के छात्र रह चुके थे। उन्होंने उस मौके पर बच्चों से कहा, प्रतियोगी बने रहना है तो तमिल के साथ-साथ अंग्रेजी, हिंदी और कम्प्यूटर साइंस भी सीखो। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट किया कि उत्तर भारत में काम करने के अवसर बढ़ रहे हैं। इसके लिए हिंदी सीखना बेहतर होगा। जून के आखिरी हफ्ते की यह खबर उत्तर भारत के अखबारों में शायद छपी भी नहीं होगी। पर इसका निहितार्थ है कि आर्थिक गतिविधिया बढ़ती हैं तो संवाद की भाषाओं की जरूरत भी बढ़ती है। अभी दो-तीन रोज पहले मलयालम चैनल एशियानेट के एक रियलिटी शो में बड़े साफ उच्चरण के साथ एक किशोर गा रहा था ‘जब भी मैं लड़की देखू मेरा दिल दीवाना बोले..।’ हिंदी की माग बढ़ती जा रही है।

दूसरी ओर पिछले दिनों संसद में हिंदी को लेकर दो-एक कटु प्रसंग हुए। मंत्री जी ने जवाब हिंदी में क्यों नहीं दिया? ऐसे ही एक विवाद में जयराम रमेश लपेटे में आ गए। यों स्थिति बिगड़ी नहीं। इधर अर्से बाद हिंदी को लेकर कुछ भावनात्मक बातें हुईं हैं। उनकी जरूरत रह नहीं गई थी, क्योंकि मीडिया के साथ हिंदी का तेजी से विस्तार हो रहा है। एक जमाने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर तकरीबन सारे विज्ञापन अंग्रेजी में होते थे। अब अंग्रेजी न्यूज चैनल पर भी हिंदी में विज्ञापन होते हैं। हिंदी का महत्व अपने आप बढ़ता जा रहा है। इसका मतलब क्या निकाला जय। क्या हिंदी श्रेष्ठ विमर्श, अभिव्यक्ति और विचार की भी भाषा है?

पिछले दिनों बजट पेश किया गया। उसके बाद वित्तमंत्री ने अंग्रेजी अखबारों और चैनलों को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दिए। इसकी एक वजह यह थी कि वे हिंदी में खुद को सहज नहीं पाते। उनकी जगह हिंदीभाषी वित्तमंत्री होते तो शायद वे हिंदी वालों से बात करते। पर क्या वे अंग्रेजी चैनलों की अवहेलना करते? टीआरपी कितनी भी क्यों न हो, ब्यूरोक्रेसी और उच्चतर राजनैतिक सर्कल में अंग्रेजी चैनल क्या हिंदी चैनलों से ज्यादा प्रतिष्ठित नहीं हैं? सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों से लेकर, साइंस-टेक्नालॉजी, अर्थव्यवस्था, प्रशासन और डिप्लोमैसी जैसे अकादमिक महत्व के सवालों पर क्या अंग्रेजी में छपे लेख और किताबें ज्यादा विश्वसनीय नहीं मानी जातीं? जिन्हें हम अंग्रेजी लेखक मानते हैं, उनकी भाषा क्या अंग्रेजी है? वे हिंदी में क्यों नहीं लिखते? शायद पैसा और सम्मान नहीं मिलता। हिंदी की 500 किताबों का एक संस्करण निकल जय तो खुशनसीबी।

जुलाई 2005 में संसद की राजभाषा समिति ने सिफारिश की कि संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट सहित देश की तमाम अदालतों में हिंदी में काम करने का रास्ता खोला जय। सरकार ने यह सिफारिश विचार के लिए विधि आयोग के पास भेज दी। पिछले दिसम्बर में विधि आयोग ने कहा कि ऐसा करना सम्भव नहीं है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी इस देश की राजभाषा है। उसी अनुच्छेद की व्यवस्था के अनुसार अंग्रेजी की अनिवार्यता चलती रहेगी। संविधान ने राजभाषा आयोग और संसदीय समिति की व्यवस्था की है।

अनुच्छेद 348 के अनुसार देश के कानूनों का आधिकारिक पाठ अंग्रेजी में ही मान्य होगा। राज्य विधान सभाएं हिंदी में कानून पास करेंगी तब भी उसका आधिकारिक अंग्रेजी अनुवाद ही अदालत को मान्य होगा। इसके व्यावहारिक कारण हैं। कानून और साइंस जैसे क्षेत्रों में एक शब्द का अर्थ माने रखता है। उस शब्द की उत्पत्ति से लेकर उसके इस्तेमाल का तरीका तक महत्वपूर्ण होता है। जरा सा फर्क पड़ने पर अदालती फैसले बदल जाते हैं।

भाषा और उसमें उपलब्ध साहित्य के विचार से हिंदी की स्थिति क्या है, इस पर कई तरह की राय होंगी, पर इतना हम देख सकते हैं कि हिंदी के पास एक भी सामान्य विश्वकोश नहीं है। कानून, दर्शन, कला, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान वगैरह पर जिस गहराई से सामग्री मौजूद होनी चाहिए, वह नहीं है। बोली के रूप में हिंदी का जवाब नहीं। मनोरंजन, मस्ती और संवाद की भाषा के रूप में उसकी तुलना में कोई भाषा नहीं। पर इसके उपभोक्ता क्या गम्भीर विषयों के बारे में नहीं सोचते? यह मानकर चलना चाहिए कि समय के साथ उसका विकास होगा। एक जमाने में अंग्रेजी की हालत भी हिंदी जैसी थी। संयोग से हमारे संविधान निर्माताओं ने इसके बारे में सोचा था।

अनुच्छेद 351 हिंदी के विकास के वास्ते सरकार को कुछ निर्देश देता है। इस निर्देश के कुछ पहलुओं पर सवाल उठाए जते हैं, पर हिंदी के विकास की जिम्मेदारी सरकार की है। यह जिम्मेदारी कानूनन है। तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन के प्रदर्शनकारियों को सरकार पेंशन देना चाहती थी। अनुच्छेद 351 इस पेंशन स्कीम के आड़े आया। हिन्दी-प्रसार को हिंदी थोपना नहीं माना ज सकता। उसका प्रसार सरकार की संवधानिक जिम्मेदारी है।

अनुभव बताता है कि भाषाएं सरकारी मदद के मुकाबले जनता के प्रेम से पनपती हैं। हिंदी समाज की अपनी  विसंगतिया हैं। हिन्दी-उर्दू और हिन्दुस्तानी के मसले ने भावनात्मक लहरें पैदा कीं। पर आज हम जिस हिंदी को देख रहे हैं, हिंदूवादी हिंदी न होकर वास्तविक हिंदी है। शुरू से यह स्वतंत्र भाषा है। उसमें देश के तमाम इलाकों की खुशबू है। उसे राष्ट्रभाषा बनाने की इच्छा बंगाल से उठी थी और महात्मा गांधी नाम के एक गुजराती ने उसे राष्ट्रीय आंदोलन की जबान बनाया। पैन इंडियन होने के लिए हिंदी का गम्भीर विमर्श की भाषा होना जरूरी नहीं। यह जरूरत हिंदी हृदय क्षेत्र की है। वहा वैचारिक कर्म के हालात क्या हैं?

भाषा के इस्तेमाल के कई पहलू हैं। मनोरंजन, सूचना, अभिव्यक्ित, विचार-विमर्श, न्याय, शिक्षा और सरकारी कामकाज जसे तमाम क्षेत्र हैं। हर जगह उसकी जरूरत है। सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किसी भारतीय भाषा के मार्फत ही हो सकेगा। हिंदी का प्रसार दूसरी भारतीय भाषाओं की कीमत पर नहीं होगा। उनके साथ समन्वय की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। हर भारतीय को कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए। अंग्रेजी, हिंदी और या तो मातृभाषा और यदि हिंदीभाषी है, तो देश की कोई अन्य प्रचलित भाषा। यूरोप में लोग दो या तीन भाषाओं का ज्ञान रखते हैं।

यह कोई मुश्किल काम नहीं है। सामान्य अर्थ में एक व्यक्ित भाषा का जितना इस्तेमाल करता है, उस लिहाज से हिंदी अपनी जगह पाती जा रही है। उसे गम्भीर विचार की भाषा भी बनना चाहिए। यह काम दोतरफा है। भाषा का विकास और उसका इस्तेमाल करने वालों का विकास साथ-साथ चलते हैं। हिंदी की जिस कमी की ओर हम इशारा कर रहे हैं, कहीं वह हमारी दरिद्रता ही तो नहीं है?

pjoshi@ hindustantimes. com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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