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उर्दू मीडिया : शर्म उनको मगर नहीं आती

उर्दू के नामचीन जासूसी उपन्यासकार इबन-ए-सफी ने अपने एक नॉवेल में लिखा है ‘चीनियों के बाप पर और पाकिस्तानियों की बात पर यकीन नहीं करना चाहिए।’ पता नहीं उन्होंने ऐसा किस आधार पर लिखा है? इतना जरूर है कि शर्म-अल-शेख का साझ बयान और मुंबई के 26/11 हमले के गुनाहगार अजमल आमिर कसाब के कबूलनामे को लेकर पाक की बयानबाजी ने ऐसी कलाबाजी खाई है। इबन-ए-सफी की कही बात अपने आप जेहन में तैरने लगती है। हिन्दुस्तानी उर्दू अखबार लिखते हैं कि पाक की बातों से लगता है कि पड़ोसी मुल्क से वफा की उम्मीद बेमानी होगी। दूसरी तरफ इसको लेकर पाकिस्तान के उदूर्र् अखबारों का रवैया बेहद निराशजनक रहा है।

यहां तक हद कर दी कि जब-जब डॉ. मनमोहन सिंह का जिक्र आया उन्होंने उनके नाम के आगे जनाब, श्री, मिस्टर या फिर वजीरेआजम जोड़ना जरूरी नहीं समझ। शर्म-अल-शेख का जिक्र आने पर मनमोहन सिंह लिखते रहे। इसमें ‘मिल्लत न्यूज’ अव्वल है। साझ बयान पर पाक उर्दू अखबारों में गिलानी के खूब कसीदे पढ़े गए। वहां के जर्नलिस्टों ने मिस्र में ही ‘वी विन’ के नारे लगाने शुरू कर दिए थे। वहां का एक अखबार लिखता है कि मिस्र से लौटते समय पाक जर्नलिस्ट गिलानी से तीन बार मिले और कूटनीतिक जीत पर उन्हें बारबार बधाई दी। उनका कहना है कि पाक ने अपनी शर्तो पर भारत को समझोते के लिए राजी किया। भारत ने बलूचिस्तान और वजीरिस्तान में दखलंदाजी की बात भी कबूल ली है। पाकिस्तानी अखबार ‘आजकल’ अपने संपादकीय में व्यंग्यात्मक लहजे में लिखता है ‘वजीर-ए-आजम यूसुफ रज गिलानी का रवया ज्यादा मसलेहाना था। ज्यादा बाइस-ए-हैरत भी। क्योंकि बलूचिस्तान में मुदाख्लत के इल्जम के बावजूद पाकिस्तान भारत की तरह जख्म कुरेदने का आदी नहीं है।’

पाक मीडिया के विपरीत हिन्दुस्तान के उर्दू अखबार ने ज्यादा गंभीरता दिखाई। वे लिखते हैं, पाक गलतफहमी में न रहे। हमने जब भी कड़ा रुख किया, पड़ोसी मुल्क की घिग्घी बंध गई। 26/11 के हमले के बाद तो पाक बचाव की हालत में आ गया था। ध्यान बटाने के लिए उसने विश्व बिरादरी के सामने अपने मुल्क पर आतंकी खतरे की बात उछालनी शुरू कर दी थी। जबकि हमने अच्छे पड़ोसी के नाते पाक से वार्ता के लिए हामी भरी। दिल्ली का ‘सहाफत’ लिखता है‘..बातचीत को पाक कमजोरी न समङो। हम जरदारी या जिलानी की खातिर राजी नहीं हुए। वहां की अवाम के लिए ऐसा किया है।’ भारत ने हमेशा पाकिस्तानी अवाम को तरजीह दी है।

मुंबई हमले से पहले तक पाकिस्तनी कलाकार, खिलाड़ी और गंभीर बीमारियों के रोगी भारत की सहूलियतों का फायदा उठाते रहे हैं। ‘जदीद खबर’ लिखता है कि पाक चाहे जो कहे। सच यह है कि विश्व बिरादरी और हिन्दुस्तान के दबाव में आकर उसे मुंबई हमले के लिए अपनी जमीन के इस्तेमाल और इसमें पाक दहशतगर्दो के हाथ होने की बात कबूलनी पड़ी। पहले पाक यह मानने को कतई तैयार नहीं था। एक उर्दू अखबार ने लिखा है कि आगे हमले नहीं होंगे या पाक की जमीन नापाक इरादे के लिए इस्तेमाल नहीं होगी। इसका यकीन नहीं किया ज सकता। ‘इंकलाब’ ने अपने संपदाकीय में साझ बयान पर पाक के साथ बीजेपी के रवये की भी आलोचना की है।

अजमल आमिर कसाब के कबूलनामे और फांसी देने की उसकी ख्वाहिश को लेकर भी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के उर्दू अखबारों के नजरिए जुदा हैं। पाक एक तरफ तो दहशतगर्दी के खात्मे में भारत की मदद व मुंबई हमले की साजिशकर्ताओं को सज देने की बात करता है। दूसरी तरफ कसाब के इकबाल-ए-जुर्म को यह कहकर ठुकरा दिया कि उसने दबाव में आकर ऐसा किया है। हिन्दुस्तान के उर्दू अखबारों ने कसाब के जुर्म कबूलने को ‘हां, मैं कातिल हूं’, ‘मैंने सैकड़ों बेगुनाहों का खून किया है’ जसे शीर्षकों से प्रमुखता से छापा। भारतीय उर्दू मीडिया को संदेह है कि कसाब का कबूलनामा भी साजिश का एक हिस्सा हो सकता है।

कबूलनामा तब क्यों आया जब अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत दौरे पर थीं। आतंकवाद पर साझ बयान आए चंद घंटे ही बीते थे। इस सप्ताह यहां के उर्दू अखबारों ने सैफ अली खां को एक फिल्म में जिहादी किरदार निभाने, कान्टीनेंटल एयरलाइंस द्वारा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को अपमानित करने और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. पी. के. अब्दुल अजीज के आर्थिक घपले में फंसने को भी अहमितयत दी है। मानव संसाधनमंत्री कपिल सिब्बल ने अजीज के कारनामे की जंच के आदेश दिए हैं। इल्जम है कि उन्होंने राष्ट्रपति के कारण बताओ नोटिस का संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। उनके खिलाफ केरल यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में भी आर्थिक अनियमितता के मामले चल रहे हैं।
                                     
लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं
malik_hashmi64 @yahoo. com

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