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‘गे’ की बल्ले-बल्ले!

अंग्रेजी ‘गे’ एक बहुआयामी शब्द है। जब तक ‘गे’ समलैंगिकता से नहीं जुड़ा, उसका एक अर्थ प्रफुल्लित था। हमें तो लगता है कि दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय के बाद सिर्फ ‘गे’ ही नहीं, पूरा देश उल्लसित है। मीडिया के अनुसार कहीं ‘गे’ उत्सव मना रहे हैं, कहीं जनता। अंग्रेजी अखबार का ख्याल है कि पोंगापंथी की संकुचित मानसिकता पर यह वचारिक उदारता की जीत है। एक पुनज्रगरण उन्नीसवीं सदी में हुआ, दूसरा इक्कीसवीं में हो रहा है। अभी तक केवल विकासशील था। समलैंगिकता को कानूनी मान्यता क्या मिली, देश रातों रात विकसित मुल्कों की कतार में आ गया।

जैसे यह हिन्दुस्तान की कुल जमा इकलौती मुश्किल थी, उसका हल कोर्ट ने निकाल दिया। पीड़ा-संत्रास के दुर्दिन बीत गए। अब सब बल्ले-बल्ले। भूख, बेरोजगारी, अभाव, सिंचाई के सूखते साधन, पक्के किए गए पोखर-तालाब, देरी से आया मानसून, कहीं बाढ़, कहीं सूखे का भय, आर्थिक मंदी, खाद्यान्न और दाल-सब्जी की अनाप-शनाप बढ़ती कीमतों जसी कोई समस्या है ही नहीं। दरअसल, कूपमंडूक हिन्दी वाले समझते ही नहीं हैं। विचारों की आधुनिकता विकास की चाबी है। ‘गे’ जब स्वीकार्य है तो सब गे हैं।

अपन ऐसे चिन्तन से सहमत हैं। मूल्यवृद्धि, बेरोजगारी, गरीब कब नहीं थे देश में? बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि उनके वक्त में भी यही मुद्दे आक्रान्त किए थे, समाज को। हम जनते हैं। आज भी अपन इन्हीं के सताए हुए हैं। कभी-कभी शक होता है। यह अनादि समस्याएं हैं। इनका अंत असंभव है। इंदिरा जी जैसी दृढ़निश्चयी नेता के, हटाए भी गरीबी टस से मस नहीं हुई तो वर्तमान के ऐरे-गैरे किस खेत की मूली हैं?

यों सिर्फ कानून से काम चले तो कानून या संविधान में बदलाव तो बाएं हाथ का खेल है, सरकार का। उस पर अमल सामाजिक मान्यता पर निर्भर है। दहेज विरोधी कानून कब से लागू है। दहेज है कि आज भी कायम ही नहीं है, उसके रेट में भी दस-बारह गुने इजफा हुए हैं। ऐसे कानूनों से बस भारतीय पुलिस के जबरजंग भ्रष्टाचारी हाथ ही मजबूत होते हैं, ‘शर्म नहीं आती दहेज देते-लेते। चलो थाने, वर्ना निकालो हमारा कमीशन।’ अपन इसीलिए खुश हैं। समलैंगिक संबंधों का कानून भी पुलिस की उगाही का साधन है। माना कि अब तक इसका सदुपयोग नहीं हो पाया है, पुलिसियों के कल्याण कार्यक्रम में। पर कौन जाने कब उनको चेत आए। कब उन्हें लगे कि इसमें भी वसूली का अच्छा खासा स्कोप है और वह चालू हो जएं। हमें यकीन है। जज साहिबान वर्दी की असलियत से परिचित हैं। यही वजह है कि उन्होंने ‘गे’ मसले की संभावित जड़ को ही उखाड़ फेंका। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।

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