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वास्तविक मुक्ति

चित्त विषयों में (गुणों) और विषय चित्त की एक-एक वृत्ति में प्रवेश कर जाते हैं, क्योंकि चित्त में चिंतन सदा विषयों का चलता है। चित्त और विषय एकाकार हो जाते हैं। इसलिए इस स्थिति में चित्त को विषयों से अलग करना बड़ा कठिन हो जता है! यह कार्य कठिन है लेकिन असंभव नहीं। यदि तत्व रूप से विचार किया जाए तो भागवद् में लिखा है कि विषय और चित्त दोनों ही जीव के देह से संबंधित है, उपाधि है। इन दोनों का आत्मा से कोई संबंध नहीं। अपनी स्वयं की वास्तविकता से ये संबंधित नहीं है। संसार के पदार्थो में अहंबुद्धि और ममबुद्धि जब तक रहती है, तब तक जीव जागता हुआ भी स्वप्न में ही मानो विचरता है।

केवल आत्मा ही सत्य स्वरूप है, इसके अलावा जो भी है, वह अस्तित्वहीन है, नाशवान है, इसलिए संसार को प्रपंच मिथ्या कहा जता है क्योंकि स्थिर नहीं है, निरंतर नाश की ओर अग्रसर है। जग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी वही एक आत्मा है। यही आत्मा जगृत अवस्था में सक्रिय इन्द्रिय, स्वभाविक अवस्था में मन के अंदर वासनामय विषयों का अनुभव और सुषुप्तावस्था की संस्कार बुद्धि का भी वही स्वामी है। इन तीनों अवस्थाओं के कारण तीनों गुणों का परिणाम है जो आत्मा में नहीं है। यह आत्मा ही सत्य है, जो अनेक रूपों में दिखती है। यही भ्रम है, माया है, अज्ञान है।

इसे केवल वास्तविक ज्ञान द्वारा ही काटा जा सकता है। इसलिए संत, ज्ञानी, ग्रंथ सभी ने यही उपदेश दिया है कि इस मिथ्या संसार देहादि रूप दृश्य जो नश्वर हैं, इससे आसक्ति मिटाकर शरीर, इन्द्रियों के व्यापाररहित होकर ही आत्मानंद का अनुभव किया ज सकता है। इस परमानंद में जो भी डूबा, वह फिर अपने देहाभिमान को भूलकर अपने सत्य स्वरूप में स्थित हो जता है, यही वास्तवित मुक्ति है। स्वप्न से जगा हुआ व्यक्ति जैसे स्वप्न की वस्तुओं को मिथ्या समझकर सुखी-दुखी नहीं होता, उसी प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त कर चुका जीव, फिर इस संसार की अनुकूलता-प्रतिकूलता से प्रभावित नहीं होता।

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