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गोर्शकोव के बहाने

कुछ ही दिन पहले संसद में बजट पेश करते समय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि सरकारी खर्चे के आंकलन के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी बनाई जाएगी। कुछ वैसी ही व्यवस्था जिसे वित्त व्यवसाय की भाषा में थर्ड पार्टी एसेसमेंट कहा जाता है। अभी तक हमारे पास ऐसी व्यवस्था नियंत्रक व लेखा महापरीक्षक यानी कैग की है। कैग की रपटें आए दिन कई घपले-घोटाले सामने लाती हैं, उनसे विपक्ष को हल्ला मचाने का मसाला भले ही मिल जाए, लेकिन आमतौर पर सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।

धीमी गति से आने वाली उसकी रपट जब तक सार्वजनिक होती है, मामला काफी पुराना हो चुका होता है। मसलन अभी चंद रोज पहले ही कैग ने दिल्ली मेट्रो रेल पर एक ‘विस्फोटक’ रिपोर्ट दी जो चंद घंटों में ही भीगा पटाखा साबित हो गई। जिस समय मेट्रो परियोजना के फेज दो का आखिरी चरण चल रहा था और एक दो दुर्घटनाओं के कारण परियोजना विवाद में थी, उस समय कैग ने फेज एक पर अपनी रपट दी। सो उस रपट को लगभग हवा में उड़ा दिया गया। लेकिन अब रूस से विमानवाहक पोत एडमिरल गोर्शकोव की खरीद पर जो कैग की रपट आई है, वह इस तरह से हाशिये में डालने लायक नहीं है। एक तो यह ऐसा पोत है, जो शुरू से ही विवाद में रहा है।

यह 1982 में ही बनकर तैयार हो गया था, लेकिन इसका इस्तेमाल 1987 में ही शुरू हो सका, क्योंकि इसके सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी थी। 1994 में यह खराब हो गया, जिसे ठीक होने में पूरा एक साल लग गया। फिर मालूम पड़ा कि यह रूस सरकार के लिए सफेद हाथी साबित हो रहा है। इस पर खर्च ज्यादा है और इसका उपयोग कम। ऐसी ही खबरों के बीच पता पड़ा कि रूस सरकार ने इसे भारत को उपहार में देने का फैसला किया है। बाद में पता पड़ा कि कुछ रकम भी देनी पड़ेगी। अब कैग यह कह रहा है कि इसके लिए जितना पैसा दिया गया, उतने में तो नया पोत आ जाता। लेकिन अब क्या हो सकता है? पैसा तो ज चुका। हमें ऐसी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए, जो खर्च के वक्त ही उसकी खामी को पकड़े और खर्च को रोकने का इंतजाम करे। कैग की व्यवस्था हमें पछताने का मौका तब देती है, जब चिड़िया खेत चुग के किसी दूसरे आसमान में पहुंच चुकी होती है।

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