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सूखे की राजनीति

मानसून के साथ होने वाले जुए के खेल में भारतीय खेती पिछले कई सालों से जीत रही थी, लेकिन इस साल बाजी मानसून के हाथ रही है। अब तक पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 42 प्रतिशत कम और पश्चिमोत्तर भारत में 37 प्रतिशत कम बारिश हुई है। सूखे की इस चपेट में देश के वे इलाके आ रहे हैं, जिन्हें धान का कटोरा कहा जाता है। इस नाते धान की खेती में अब तक 21 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। गनीमत मानिए कि मध्य भारत में मानसून सामान्य से थोड़ा बेहतर है, वरना आर्थिक मंदी के इस दौर में सूखे की यह चुनौती और बड़ी होती।

मानसून का आना और न आना इंसानी व्यवस्था के वश के बाहर है, इसलिए इसका दोष हम किसी को नहीं दे सकते। लेकिन मानसून का अनुमान न लगा पाने और समय रहते उससे होने वाली कमियों से निपटने के लिए उचित प्रबंधन न कर पाने के लिए हम अपने राज-समाज को दोष दे सकते हैं और देना भी चाहिए। सूखा पड़ने का अनुमान पहले हो जाने पर धान की छोटी अवधि की प्रजतियां लगाने से लेकर तिलहन, दलहन और मोटे अनाजों की खेती की तरफ मुड़ा जा सकता है। गेहूं, चावल और अन्य खाद्यान्न के निर्यात पर समय रहते रोक लगाई जा सकती है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ज्यादा व्यापक बना कर खाद्य सुरक्षा के दायरे में अधिक से अधिक लोगों को लाया जा सकता है। हालांकि केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने सूखे से निपटने के लिए अपना खाका स्पष्ट करना शुरू कर दिया है, जिसमें किसानों को डीजल पर सब्सिडी देने से लेकर सूखाग्रस्त राज्यों को अनाज व अन्य प्रकार की सहायता देना शामिल है।

सरकार ने देर से ही सही पर अब अनाज के निर्यात पर पाबंदी की घोषणा भी कर दी है। इस दौरान वह खाद्य सुरक्षा अधिनियम भी पास कराने की तैयारी कर रही है। इन तमाम सदिच्छाओं के बावजूद आम आदमी की सहायता में जो चीज आड़े आती है, वह है प्रशासनिक मशीनरी की अक्षमता और केंद्र व राज्य की शासक पार्टियों की राजनीति। इसी के चलते कृषिमंत्री को लोकसभा में कहना ही पड़ा कि उत्तर प्रदेश से तालमेल में दिक्कतें आ रही हैं। संवाद और संपर्कहीनता की इन स्थितियों को दूर करने में मीडिया और गैरसरकारी संगठन बड़ी भूमिका निभा सकते हैं और उन्हें निभानी भी चाहिए। जहिर है जब वे ऐसा करेंगे तभी अर्थशास्त्री अमृत्य सेन की यह सैद्धांतिक स्थापना सही साबित होगी कि सच्चे लोकतांत्रिक देश में अकाल नहीं पड़ा करते।

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