अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बुजुर्गो के सम्मान का संकल्प भी कम नहीं

शिव भक्त कांवड़ियों का महाकुंभ समाप्त हुआ। लाखों श्रद्धालुओं ने हरिद्वार या गंगोत्री से जल ला कर श्रद्धा से अपने-अपने गंतव्य स्थान पर शिवलिंग पर चढ़ाए और अपनी मनोकामना पूर्ण होने की कामना की। कितना अच्छा हो कि हम इसी श्रद्धा और विश्वास के साथ संकल्प लें कि हम अपने-अपने घरों में अपने माता-पिता, बुजुर्गो का सम्मान करेंगे। कभी भी उनका अपमान नहीं करेंगे। अपने भाई-बहिनों, पड़ोसियों का सहयोग करेंगे। हमें धार्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक और व्यवहारकुशल होना भी आवश्यक है।
शिव प्रसाद शर्मा, हापुड़

परेशान करता है एनडीपीएल
एनडीपीएल से कनेक्शन लेना जीवट का काम है। आपको अपना मीटर कनेक्शन फोन पर ही बुक कराना होगा। फोन का मिलना टेढ़ी खीर। मिल जए तो यह बटन दबाएं वह बटन दबाएं। खाली प्लाट पर हजरों का बिल बकाया बताया जएगा। यह भी आपने ठीक करा लिया तो किसी भी दिन वहां का कर्मचारी बिना सूचना या एकाध घंटे की सूचना पर आ धमकेगा। मतलब जो भी तरीका बना रखा है, वह सिर्फ जनता को परेशान करने के लिए।
इन्द्रसिंह धिगान, किंग्जवे कैम्प, दिल्ली

अपनी-अपनी ड्यूटी
दशरथपुरी में गलियों में पानी के कनेक्शन काटने आए जलबोर्ड के अधिकारियों को महिलाओं ने ‘चल ताऊ’ कर दिया। अधिकारियों का दोष इतना था कि वे गुजर रही नई पाइप लाइनों पर जोड़े गए अवध कनेक्शनों को हटाने गए थे। इसमें दोषी कौन है? जल बोर्ड के अधिकारी जो अपनी डच्यूटी निभाने गए थे या वे महिलाएं जो अपनी पारिवारिक डच्यूटी निभा रही थीं? यह तो तय है कि आने वाले समय में जल के लिए जंग होगी। महिलाओं के लिए चूल्हा-चौका, बर्तन-भांडे, कपड़े-लत्ते जैसे कार्य पानी के बिना व्यर्थ हैं। और वह भी तब, जब पुरानी पाइप लाइनों में से पानी नदारद हो जाए। इसलिए गुस्सा तो आना लाजिमी है। वैसे जितनी फुर्ती से जल बोर्ड के अधिकारी दशरथपुरी पहुंच गए, उन्हें उतनी ही फुर्ती से सड़कों पर पाइप से रिसते हुए पानी के इलाज के लिए पहुंचना चाहिए।
राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

मानसिकता को भी बदलें
इतिहास गवाह है कि हमारे समाज में परिवर्तन जब-जब हुआ उसका विरोध भी बड़े पैमाने पर हुआ है। शायद इसलिए समलैंगिकता के मुद्दे ने जब तूल पकड़ा और दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी हरी झंडी दी तो इसका विरोध भी बड़े पैमाने पर किया गया। परंतु बहस का मुद्दा ये नहीं होना चाहिए कि धारा 377 में कितना बदलाव किया जाए व कितना नहीं, बल्कि बहस का विषय यह होना चाहिए कि समाज की मानसिकता में कितना बदलाव हुआ है और कितना होना चाहिए। समलैंगिकता को कई देश वध करार दे चुके हैं और ऐसे में यदि भारत भी समलैंगिक जोड़ों को खुली हवा में सांस लेने की इजजत देता है तो इसमें कुछ गलत भी नहीं है।
अनूप आकाश वर्मा, जमिया, नई दिल्ली

नीयत पे भरोसा
हमें उनकी नीयत पे
पूरा भरोसा है।
सिंदूर मांग से
जरा सा हट के
परोसा है।
शरद जायसवाल, कटनी, मध्य प्रदेश

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बुजुर्गो के सम्मान का संकल्प भी कम नहीं