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रक्षा सौदों पर कैग ने की रक्षा मंत्रालय की खिंचाई

रक्षा सौदों पर कैग ने की रक्षा मंत्रालय की खिंचाई

कैग ने रक्षा मंत्रालय को भारतीय वायु सेना के लिए 40 विमान की खरीद मामले में आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि मंत्रालय ने अनुबंध में क्षतिपूर्ति उपबंध नहीं जोड़ा जिससे वह 2,711 करोड़ रुपये प्राप्त नहीं कर सकी।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 9,036.84 करोड़ रूपये के 40 विमान की खरीद में रक्षा मंत्रालय भारतीय वायुसेना ने अनुबंध में क्षतिपूर्ति का उपबंध नहीं जोड़ सकी, जिसके कारण वह 2,711 करोड़ रूपये का लाभ नहीं प्राप्त कर सकी। इसके मद्देनजर विमान के जल्द अधिग्रहण का मकसद भी हासिल नहीं किया जा सका। हालांकि रिपोर्ट में विमान के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है ।

सदन में शुक्रवार को पेश रिपोर्ट के अनुसार भारतीय वायु सेना की शक्ति में गिरावट के मद्देनजर मार्च 2007 में हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड के साथ 40 विमान की खरीद के लिए अनुबंध किया गया। यह अनुबंध 9,036.84 करोड़ रूपये का था। इन विमानों की आपूर्ति चरणबद्ध तरीके से 2008-11 के बीच होनी थी।

रिपोर्ट के अनुसार अनुबंध में रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2006 के  तहत उपकरणों की खरीद तीन तरह से हो सकती है, जिसमें भारतीय कंपनियों से खरीद, विदेशी कंपनियों से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के तहत खरीद और विदेशी कंपनी से विशुद्ध खरीद शामिल है।

भारतीय वायु सेना ने भारतीय कंपनी से खरीद उपबंध के तहत हिन्दुस्तान एयरोनाटिकल लिमिटेड से खरीद को मंजूरी देते हुए कहा कि यह विमान और प्रणाली की खरीद के पिछले आर्डर का पुनरावृति है जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के तहत हो रही है।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अनुबंध में यह वर्गीकरण गलत था, जो विदेशी आपूर्तिकर्ता को अनुचित तरीके से लाभ पहुंचाने वाला था। एचएएल ने पहले ही प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के तहत 140 विमानों के निर्माण और आपूर्ति का जिम्मा लिया हुआ था।

नए आर्डर में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के पिछले उपबंध का कोई लाभ नहीं प्राप्त होने वाला था और न ही एचएएल के पास निर्धारित समयसीमा के भीतर नये आर्डर की पूर्ति करने की सुविधा प्राप्त थी। रिपोर्ट के अनुसार रूस की कंपनी के साथ उपकरणों की आपूर्ति की बातचीत में कीमतों पर मोलभाव सीधे विमान की आपूर्ति के संदर्भ में की गई न कि एचएएल में उसे तैयार करने पर ।

कैग ने कहा कि अनुबंध में गलत व्याख्या से भारतीय रक्षा उद्योग 2,711 करोड़ रूपये प्राप्त करने में विफल रहा।  रपट में कहा गया कि पनडुब्बी का जो डिजाइन चुना गया है, उसे अभी किसी अन्य देश की नौसेना ने आजमाया नहीं है। परियोजना की लागत अक्तूबर 2002 के 12, 609 करोड़ रूपये के स्तर से बढ़कर अक्तूबर 2005 में 15, 447 करोड़ रूपये हो गयी, जब सौदे पर दस्तखत किये गये ।

कैग ने कहा कि सौदे के प्रावधानों के कारण वेंडर को कम से कम 349 करोड़ रूपये का फायदा हुआ । इसके अलावा उसे अन्य फायदे भी हुए । रपट में कहा गया कि भारत ने आपूर्तिकर्ता कंपनी को वारंटी, प्रदर्शन बैंक गारंटी, कीमत फार्मूला, पंचाट प्रावधान, क्षतिपूर्ति, एजेंसी के कमीशन और प्रदर्शन के मानकों को लेकर कई रियायतें दी हैं।

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