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अनिवार्य शिक्षा ही नहीं, व्यवस्था पर भी तो विमर्श हो

करोड़ों नागरिकों के जीवन से जुड़ी जनकल्याण नीतिया हमारे यहा कुछ ऐसी सहजता से बन जया करती हैं, जैसे (बाइबिल के अनुसार) कभी खुदा ने खुदाई बनाई थी। ‘लैट देयर बि लाइट ही सैड, एण्ड देयर वॉज लाइट’ (प्रकाश हो। उन्होंने कहा, और प्रकाश हो गया।) अलबत्ता बन जाने के बाद उनको अमली जामा पहनाते हुए लोगबाग अक्सर समझ नहीं पाते कि शुरू कहा से करें। दिनाक इक्कीस जुलाई को छह से 14 वर्ष की आयु वाले भारतीय बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने वाला एक ऐतिहासिक बिल मानव संसाधनमंत्री कपिल सिब्बल ने राज्यसभा के पटल पर रखा। उन्होंने कहा कि यह पारित होकर इक्कीसवीं सदी के भारत का स्वरूप रचने वाला कानून सिद्ध होगा।

देश की भावी पीढ़ी के मानसिक विकास और शिक्षा को सर्वजनसुलभ बनाने के मुद्दे पर हर दल ने ताज आम चुनावों के दौरान अपने घोषणा-पत्रों में कई पृष्ठ रंगे थे। पर प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बिल से जुड़े मुद्दों पर बहस के दौरान सिर्फ चार सांसद बोले, जिनमें से दो वामदलों, एक शिवसेना तथा एक जद (यू) से थे। इतने महत्वपूर्ण विधेयक पर बहस करने के लिए लगभग 245 सदस्यीय राज्यसभा के सिर्फ 60 सांसद मौजूद थे, जिनकी तादाद बिल पारित होने तक सिर्फ 54 ही रह गई थी। 25 सदस्य सत्तापक्ष के और 29 सदस्य विपक्ष के यानी इस ऐतिहासिक विधेयक को लाने वाले सत्तापक्ष को शर्मसार करने की नीयत से विपक्ष उस वक्त मतविभाजन की मांग करके इस ऐतिहासिक बिल को गिरा सकता था। सौभाग्य से यह हुआ नहीं, और बिल पास हो गया।

राज्यसभा से पारित होकर अब यह बिल लोकसभा में जाएगा। क्या लोकसभा में भी इसे वैसी ही अनमनी हड़बड़ी से पास कर दिया जाएगा? यह तो हम नहीं जानते, लेकिन फिर भी जनहित में इस विधेयक के कुछ बहुत महत्वपूर्ण और चर्चा के लायक पहलुओं को उजागर करना हम अपना कर्तव्य समझते हैं। अस्तु।

पहली बात, लगातार पाच सालों तक प्राइमरी शालाओं के पंजीकृत छात्रों को कैसे थाम कर रखा जाए? मार्च 2005 की नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रपट के अनुसार सर्वशिक्षा अभियान के चार बरस बीतने के बाद भी 40 प्रतिशत बच्चे अधबीच पढ़ाई छोड़कर स्कूली तंत्र से बाहर चले गए हैं। स्कूलों में गरीबों के बच्चों की इस अनुपस्थिति की वजह पढ़ाई के प्रति उनकी अनिच्छा नहीं, बल्कि उनके गरीब अभिभावकों की सिर्फ अपने बूते रोजी-रोटी कमाने की अक्षमता है। कार्पेट उद्योग, पटाखा उद्योग, चूड़ी उद्योग और शहरी ढाबों तथा घरों में नौकरी को भेजे गए ऐसे लाखों बाल श्रमिक देश में हर कहीं हैं।

समय-समय पर धरपकड़ के बाद उन्हें मा-बाप के सुपुर्द किया जाता है। लेकिन कुछ दिन बाद वे फिर काम पर भेज दिए जाते हैं। बेटिया तो अक्सर स्कूल से बाहर ही रखी जाती हैं, ताकि मा-बाप की गैरहाजिरी में वे घर सभालें, पशुओं का चारा-पानी लाए। चर्चित फिल्म ‘स्माइल पिंकी’ की नन्हीं नायिका पिंकी तक ‘कान’ फिल्म समारोह से गांव वापस आकर स्कूल जाने की बजाए बकरिया चराते, बरतन माजते दिन काट रही है। बच्चों को स्कूल भेजना जब गरीब मा-बाप को भारी पड़ता हो, और उधर नए कानून की अवहेलना करने पर स्थानीय पुलिस को उन अभिभावकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का अधिकार मिल गया, तो इस कानून से बच्चों का भला हो न हो, इसके बहाने पुलिस द्वारा गरीबों के उत्पीड़न और दोहन की नई-नई राहों के खुल जाने का खतरा बनता है।

फिर आता है अनिवार्य बनाकर दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण सवाल। आज जो भी तनिक सम्पन्न परिवार हैं, वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले निजी स्कूलों में ही भेजना पसंद करते हैं। शिक्षा सचमुच में समतामूलक बने इसके लिए खस्ताहाल सरकारी स्कूलों में आमूलचूल सुधार जरूरी हैं, ताकि बच्चों को अक्सर संसाधनहीन कच्चे शिक्षा भवनों में दी जा रही उबाऊ, घटिया और स्तरहीन शिक्षा से छुटकारा मिले और वे निजी स्कूलों में पढ़ने वाले सम्पन्न घरों के बच्चों के साथ स्पर्धा में उतरने के सचमुच काबिल बन सकें। यह सही है कि ऊची तालीम भी जरूरी है और उस पर ऊचा खर्च आता है।
लेकिन बुनियादी तालीम की कीमत पर ऊची शिक्षा को खाद-पानी देना सयानापन नहीं, अन्यायी निष्ठुरता है। जिस दिन राज्यसभा में बिना खास बहस के बुनियादी तालीम की अनिवार्यता को मान लिया गया, उसी दिन पर्यावरणमंत्री को वरिष्ठ सपा नेता ने हिंदी में सवाल का जवाब न देने पर टोका और अंग्रेजी बनाम भाषा पर पर्यावरण मंत्री के साथ सांसदों की तीखी नोंक-झोंक हो गई। अगर देश-परदेश में अच्छा कमाने-खाने के सभी रास्तों पर अंग्रेजी के बिना न चल पाने की दु:खद अनिवार्यता को राजनीतिक वजहों से गोपनीय और अकथनीय बना दिया गया तो संसद में हिंदी के प्रयोग के लिए यू अड़ कर भी क्या होगा? वैसे भी इन अड़ने वालों ने खुद अपने नौनिहालों को सरकारी स्कूलों में कहां भेज है?

गए सप्ताह लेखिका की कानपुर आई.आई.टी. के एक युवा प्रोफेसर से भेंट हुई, जो आई.आई.टी. के बाद कैम्ब्रिज तथा कॉर्नेल विश्वविद्यालयों से उच्च शिक्षा लेकर पढ़ाने के लिए स्वदेश लौट आए हैं, और अपने काम से बहुत सन्तुष्ट हैं। उन्होंने बताया कि उनके संस्थान में हिंदी पट्टी के कमजोर वर्गो से आए कई ऐसे मेधावी छात्र हैं, जिन्होंने सरकारी स्कूलों में हिंदी माध्यम से पढ़ाई की, और प्रवेश परीक्षा में भी अच्छी कामयाबी पाई है। लेकिन संस्थान में आने के बाद पढ़ाई का माध्यम बदलने और अपना अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण वे अक्सर अभिव्यक्ति के स्तर पर खुद को कुंठित और असहाय पाते हैं। ‘80 के दशक में मध्यप्रदेश के एक शीर्ष तकनीकी शिक्षा संस्थान में अंग्रेजी पढ़ा चुकी इस लेखिका का भी यही अनुभव रहा है। यानी कुल मिलाकर चौथाई सदी बाद भी अंग्रेजी को बेवजह हौवा मानकर पाठ्यक्रम से बाहर रखना सरकारी स्कूलों की तालीम लेने वाले मेधावी छात्रों को भी भारी पड़ रहा है।

इस पर पाखण्ड त्याग कर ईमानदार विमर्श जरूरी है। देश के मुख्य न्यायमूर्ति ने भी कहा कि शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने का कानून देश के हर बच्चे के लिए समान शिक्षा के जिस अधिकार की पेशकश कर रहा है, सरकारी और गैरसरकारी स्कूलों के बीच बढ़ती ज रही भाषा और शिक्षण से जुड़ी वर्तमान विसंगतिया यदि न सुधारी गईं तो वे उसे एक मजक बनाकर रख देंगी। आधी सदी पहले ऑक्सफोर्ड के एक राजनैतिक विश्लेषक आइजइया बर्लिन ने कहा था कि लोकतंत्र में वधानिक अधिकार भी दो तरह के होते हैं : नकारात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक अधिकार नागरिकों के निजी जीवन से जुड़े अधिकार हैं, जिनमें राज्य का नियंत्रण अमान्य है (समलैंगिकता को लेकर उच्चतम न्यायालय की ताज स्थापना इसे रेखांकित कर भी रही है)।

इसके उलट सकारात्मक अधिकार ऐसे मौलिक अधिकार हैं, जिन्हें कायम रखने के लिए नागरिकों, विशेषकर कमजोर तबके के लोगों को निरंतर विभिन्न राजकीय सेवाओं और मदद की जरूरत होती है। सकारात्मक मौलिक अधिकारों को आम आदमी तक पहुचा कर उनकी रक्षा करने का काम काफी कष्टसाध्य है। राज्य द्वारा सिर्फ अधिक पैसा खर्च करने से बात नहीं बनती। पग-पग पर नागरिकों के लिए तमाम तरह की खास स्थितिया और सुविधाए भी उपलब्ध करानी होती हैं, जिससे वे इस अधिकार का निश्चिंत होकर उपभोग कर सकें। शिक्षा का मौलिक अधिकार ऐसा ही सकारात्मक अधिकार है। क्या हम उम्मीद करें कि इस अधिकार की जरूरत और रक्षा पर लोकसभा में हमारे मान्य सांसद अब गहरा और ईमानदार विचार-विमर्श करेंगे? अब तक तो हिलेरी क्लिंटन भी जा चुकी हैं।

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