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हा हा हिंदी दुर्दशा

एक बार फिर अंग्रेजी के पक्ष में बातें कही गई एक बार फिर दिल टूटा और एक बार फिर हिंदी की हैसियत याद आई। एक बार मन हुआ कि कहें : ‘हा हा हिंदी दुर्दशा न देखी जाई, हाय हाय अंग्रेजी महिमा सही न जाई’ लेकिन इतने भर से अंग्रेजी चमक-दमक महिमा और रुतबा, पव्वा और ताकत और नाज-नखरे नहीं जाते। बात कन्नड़ की अनिवार्यता की रही और मार हिंदी भाषी इस लेखक पर पड़ी कि लगा कि अंग्रेजी के बिना अब काम नहीं चलेगा!

अंग्रेजी बिन सब सून! अब तक का जीवन बेकार। उसके बिन नो कपंटीशन! आज की दुनिया कह रही है : तू अंग्रेजी नहीं जानता तब तू कुछ नहीं जानता। इस तरह तेरा तो जीना बेकार है।

पचपन-साठ करोड़ की हिंदी बोलने वाली, बरतने वाली हिंदी जनता बेकार। उसका कोई भविष्य नहीं नो फ्यूचर। सारा फ्यूचर अंग्रेजी चर गई! इतने पर भी संसद में हिंदी में बहस करने वालों ने अंग्रेजी में जबाव न देने वाले मंत्री महोदय से कहा कि जनाब हिंदी के सवाल का हिंदी में जबाव दीजिए! मंत्री जी अंग्रेजी में ही बोलने के आदी रहे लेकिन हिंदी वाले अड़े रहे। संसद में हिंदी इसी तरह हो सकती थी। होती रहनी है। आपके लिए हिंदी वाला जब इतना नान-कंपटीटिव है तो उसकी क्या सुनी जाए? जिसका कोई फ्यूचर नहीं, उसको क्या लिफ्ट दी जाए?

हिंदी की हीनता का मारा ये मन अंग्रेजी से उस दिन पंगा लेने को उतावला हो उठा। मगर पंगे की सोचते ही लगा कि यार बात तो समझ! अगर अंग्रेजी रोटी-रोजी की गारंटी करने वाली भाषा है सफलता की एक मात्र भाषा है तो जरा ये तो देख कि अंग्रेजी की अपनी दुनिया के क्या हालात हैं और भारत में अंग्रेजी दुनिया का क्या रंग है? हीनता बोध से निकलकर जब सोचा तो पाया कि कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने कहा है उसे अपने स्कूलों में हिंदी पढ़ानी है। उसके लिए हिंदी दक्ष और पर्याप्त के शिक्षक नहीं मिल रहे। सोचते ही गिरते मन को सहारा मिला। अमेरिका तो अंग्रेजी भाषी देश है, वहां हिंदी आ रही है और इधर कुछ इस तरह कहा जा रहा है कि एक अरब से ज्यादा आबादी वाली देसी भाषाओं का, हिंदी का कोई भविष्य नहीं है।

अंग्रेजी वालों का अहवाल लेने के लिए सोचने लगा तो पाया कि जो दो -चार दोस्त हैं और अंग्रेजी के पढ़े-लिखे कहे जाते हैं, वे तो बात-चीत में हिंदी बोलते हैं, घर में भी बोलते हैं और कई बार ज्यादा शुद्ध बोलते हैं। वे किस दुनिया में रहते हैं? यह विचारने का मन हुआ। माना जा सकता है कि उनका भविष्य सुंदर ही नहीं होगा, गोल्डन-गोल्डन होगा। लेकिन जितनों को जानता हूं, उन्हें देख कह सकता हूं कि गोल्डन-फोल्डन तो नहीं है, हमारे जैसा ही हाल! जैसे हम हिंदी वाले! वैसे ही वे अंग्रेजी वाले! अंग्रजी दुनिया उन्हें बराबर की लिफ्ट नहीं देती!

अंग्रेजी एक महत्वपूर्ण भाषा है। और इस वक्त पश्चिमी दुनिया की बिजनेस की भाषा भी है। संस्कृति की भाषा भी है। ज्ञान की भाषा भी है। यहां तक कोई कहे तो ठीक। लेकिन इसके बिना जीवन बेकार है, ऐसी बात कुछ अतिरंजना है। अरे भाई दुनिया के अनंत-अरबों लोग जो जीवन जीते हैं, वह जीवन किसी मानी में व्यर्थ नहीं है। अंग्रेजी के इकनोमिस्टि इन दिनों अपने ही अंग्रेजी छाप इकनॉमिक्स पर भरोसा खो रहे हैं। उसका मजाक उड़ा रहे हैं। हिसाब-किताब बही-खातों में अंग्रेजी के ज्ञान के बावजूद जो कबाड़ा होता रहा, उसकी लीला डरावनी है। देखते देखते मंदी आ गई और अंग्रेजी भाषा-भाषी अपनी ही भूमि में बेकार हो उठे! अपनी दुर्गत से उबरने के लिए अंग्रेजी दुनिया हिंदी का दौरा करती रहती है।

तकनीकी ग्लोबल आर्थिकी और ग्लोबलाइजेशन ने अगर एक बिजनेस भाषा की ओर रुख किया है तो जमीनी भाषाओं को भी वह जगह देने को बाध्य हो रहा है, क्योंकि माल जिस बंदरगाह पर उतरता है और जिस जेब से खरीदा जाता है, वह किसी कन्नड, किसी बंगला, किसी हिंदी की जेब है। सोचते अंग्रेजी में हैं। कमाई हिंदी करती है। रुतबा अंग्रेजी मारती है। अंग्रेजी कितना ही उड़ ले, उतरना हिंदी या किसी देसी भाषा के अड्डे पर ही पड़ता है। अड्डे को हीन बताकर उसका अपमान कर अड्डे को प्रतिकारी पोजीशन लेने को विवश करना है तो करें।

अंग्रेजी जी! चॉयस त्वाडी ए! तुसी जानो!

दुधारू गाय की दो लातें तक सही जाती हैं! हिंदी अंग्रेजी सिस्टर को लात मारने का मूड नहीं रखती। वह लात के दौर से बहनापे के दौर तक आई है। एक बहन आंख तरेरेगी तो क्या जनतंत्र में दूसरी नहीं तरेरेगी?

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  • Web Title:हा हा हिंदी दुर्दशा