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चैनलों के विवेक पर सूर्यग्रहण

समाचार मीडिया खासकर हिंदी समाचार चैनलों का पहले भी तर्क और विज्ञान से कोई खास लगाव नहीं था। सूर्यग्रहण जैसी नितांत प्रातिक और खगोलीय परिघटना को जिस तरह से कुछ प्रमुख हिंदी समाचार चैनलों और अखबारों ने अंधविश्वास फैलाने और उसे मजबूत बनाने का मौका बना दिया, उससे एक बार फिर इस बात की पुष्टि हो गई कि उनके शब्दकोष से विज्ञान और तर्क जैसे शब्द बेदखल हो गए हैं। टीआरपी की दौड़ में सबसे आगे बताए जाने वाले कुछ समाचार चैनलों ने सूर्यग्रहण जैसी निश्चित खगोलीय परिघटना को रहस्यमय बना दिया। उन्होंने सूर्यग्रहण के बहाने तमाम तरह के अनिष्टों का भय दिखाते हुए दर्शकों को डराना शुरू कर दिया। सूर्यग्रहण जैसी खगोलीय परिघटना की व्याख्या के लिए वैज्ञानिकों और खगोलविदों से चर्चा करने के बजाय चैनलों और अखबारों ने ज्योतिषियों को कमान थमाकर जिस तरह से दर्शकों का भयादोहन किया, वह हैरान करने वाला था।

सूर्यग्रहण के कुछ दिनों पहले से ही कुछ समाचार चैनलों और अखबारों ने इसके काल्पनिक कुप्रभावों को लेकर जिस तरह से उन्मादपूर्ण माहौल बनाने की कोशिश की, वह न सिर्फ देश में वैज्ञानिक मानसिकता के विकास को नुकसान पहुंचाने वाला था, बल्कि वह टेलीविजन चैनलों की कार्यक्रम आचारसंहिता का भी उल्लंघन था। हमारे जनसंचार माध्यम यह सब उस समय कर रहे हैं, जब भारत दुनिया में अपने वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक संसाधनों के कारण विशेष पहचान बना रहा है। दूसरी ओर, देश वैज्ञानिक प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के लिए विशेष अभियान चला रहा है। विज्ञान का विकास किसी शून्य में नहीं होता। विज्ञान के विकास के लिए समाज में व्यापक वैज्ञानिक मानसिकता का प्रसार होना जरूरी है।

वैज्ञानिक मानसिकता के प्रसार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जनसंचार माध्यमों खासकर समाचार मीडिया की मानी जाती है। उसमें भी भाषाई मीडिया की जिम्मेदारी सबसे अधिक है, क्योंकि आमलोगों से सबसे अधिक जुड़ाव उनका ही है। ऐसा नहीं है कि समाचार मीडिया ने वैज्ञानिक मानसिकता के विकास में कोई भूमिका नहीं निभायी है या उसकी दिलचस्पी सिर्फ अंधविश्वास फैलाने में रही है। इसी मीडिया ने एक दशक पहले गणेश को दूध पिलाने वाली घटना का जिस तरह पर्दाफाश किया था, वह इस बात का शानदार उदाहरण था कि ऐसे मौकों पर समाचार मीडिया क्या कुछ कर सकता है। वही मीडिया आज अंधविश्वास फैलाने में सबसे आगे दिखाई पड़ रहा है।

यह केबल नेटवर्क रेग्यूलेशन कानून के तहत कार्यक्रम आचार संहिता का भी उल्लंघन है, जिसमें साफतौर पर अंधविश्वास फैलाने पर रोक का प्रावधान है। लेकिन शायद चैनलों को इसकी कोई परवाह नहीं रह गई है। इसके साथ ही यह समाचार चैनलों के आत्मनियमन के दावे की भी पोल खोलने के लिए काफी है। इससे यह बात तो साफ हो गई कि टीआरपी की अंधी होड़ में आत्मनियमन एक निर्थक शब्द है।

सूर्यग्रहण के कवरेज ने चैनलों के आत्मनियमन के दावे को बेमतलब बना दिया है। चैनलों का यही रवैया बना रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब उनके सार्वजनिक रेग्युलेशन की माग ना सिर्फ और जोर पकड़ने लगेगी, बल्कि उसे एक तरह की सामाजिक-राजनीतिक स्वीकृति भी मिल जाएगी। इसके लिए सबसे अधिक समाचार चैनल ही जिम्मेदार होंगे। हालाकि ये अभिव्यक्ति की आजादी के व्यापक अधिकार के लिए एक बड़ी त्रासदी साबित हो सकती है लेकिन इसे चैनल ही आमंत्रित कर रहे हैं।

इस बार एक अच्छी बात यह हुई कि कुछ गिने-चुने समाचार चैनलों और अखबारों ने इस भेड़चाल में शामिल होने के बजाय सूर्यग्रहण को एक खगोलीय परिघटना के रूप में ही दिखाया और खुद को अंधविश्वासों से दूर रखा। निश्चय ही, ऐसे चैनलों और अखबारों की तारीफ की जानी चाहिए, जो भेड़चाल में शामिल होने इनकार कर रहे हैं। इससे यह संभावना बनती है कि अंधविश्वास फैलाने और दर्शकों का भयादोहन के जरिए टीआरपी बटोरने के शॉर्टकट से अलग रास्ता भी है। लेकिन इन चैनलों से ये भी अपेक्षा है कि वे अपने संगठन न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के मंच पर उन चैनलों के खिलाफ आवाज जरूर उठाएं, जिन्होंने आत्मनियमन की धज्जिया उड़ा दी।

इससे इतर, यह उन वैज्ञानिक एजेंसियों की विफलता का भी प्रमाण है जिन पर वैज्ञानिक मानसिकता के विकास का जिम्मा है और जो हर साल करोड़ों रुपए विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए खर्च करती हैं। सूर्यग्रहण के मौके पर वे भी गायब दिखीं, जबकि यह एक शानदार अवसर था, जब वे लोगों में वैज्ञानिक मानसिकता के प्रचार-प्रसार के लिए इस मौके का इस्तेमाल कर सकती थी। उन्हें भी अपनी रणनीति पर जरूर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि वैज्ञानिक मानसिकता के विकास में उनकी भी बड़ी भूमिका है। लेकिन हर ऐसे मौके पर वे मौका चूकने के लिए अभिशप्त सी हो गई हैं।

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