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बस चले तो आज ही मैदान पर उतर जाऊं

बलजीत सिंह, भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर हैं। एक सप्ताह हो गया है उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती हुए। पुणे में प्रैक्टिस के दौरान उनकी दाईं आंख में गोल्फ बॉल जा लगी थी। इससे उनकी आंख के रेटिना, कोर्निया और लेंस क्षतिग्रस्त हो गए थे। ऑपरेशन हो चुका है। उनकी आंख पूरी तरह से ठीक हो भी पाएगी या नहीं और रोशनी पूरी तरह से वापस आ भी पाएगी या नहीं, इसको लेकर अभी भी प्रश्नचिन्ह बना हुआ है। अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में उनसे रू-ब-रू हुए संजीव गर्ग

एक खिलाड़ी के लिए कितना मुश्किल है खेल से दूर रहना?

खिलाड़ी के लिए सबसे मुश्किल काम यही है। जो खिलाड़ी चार-पांच घंटे रोजना प्रैक्टिस करता हो और उसे पूरा-पूरा दिन बिस्तर पर रहना पड़ा उसके लिए इससे बड़ी सजा और क्या हो सकती है। वैसे भी एक-दो दिन की बात तो है नहीं। पता नहीं और कितने दिन मुझे इस हाल में रहना पड़ेगा।

गोलकीपिंग कोच रोमियो जेम्स आपसे अस्पताल में मिलने आए तो उनकी प्रतिक्रिया क्या थी?

रोमियो सर की आंखों में आंसू थे। वे इस सारे वाकये के लिए खुद को कसूरवार मान रहे थे। मेरे जल्दी ठीक होने के लिए उन्होंने चर्च में जाकर दुआ तक मांगी। वैसे भी इसमें उनका क्या कसूर है। हम लोग गोल्फ बॉल से प्रैक्टिस तो काफी समय से कर रहे थे। सब किस्मत का खेल है।

कभी सोचा भी था कि एक दिन इस तरह की चोट का सामना करना पड़ेगा?

ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं आया। वैसे खिलाड़ी और चोट का तो चोली-दामन का सा साथ है। हां, जब भी मैं पूरी तरह से फिट होता था तो मुझे हमेशा यह डर सताता रहता था कि कहीं मैं चोटिल न हो जाऊं। आंख में जिस दिन चोट लगी उस दिन सुबह टीम के फिजियो ने मुझसे कहा था कि मैं पहले से कहीं ज्यादा फिट लग रहा हूं। उस समय मेरे मन में एक ही विचार आया कि जब भी मेरी फिटनेस अच्छी होती है तभी मेरे साथ कोई न कोई अनहोनी हो जाती है। उसी शाम मेरे साथ यह दुर्घटना घट गई।

हॉकी में गोल्फ गेंद से प्रैक्टिस को आप कितना उचित मानते हैं?

वैसे तो गोल्फ गेंद का प्रयोग काफी समय से होता आ रहा है। लेकिन सच कहूं तो मैं नहीं चाहता कि भविष्य में गोल्फ गेंदों का प्रयोग किया जाए। गोलकीपिंग कोच रोमियो सर ने खुद भविष्य में कभी गोल्फ गेंद से प्रैक्टिस न कराने की बात कही है। गोलकीपर के रिफ्लेक्शन को तेज करने के लिए प्रैक्टिस के दौरान गोल्फ गेंदों का प्रयोग किया जाता है।

कब तक वापसी की उम्मीद है?

बिस्तर पर कौन पड़े रहना चाहता है। मेरा बस चले तो मैं आज ही मैदान पर उतर जाऊं। अब तो सब डॉक्टरों की सलाह से करना है। डॉक्टर तो यही कहते हैं कि अभी आंख को ठीक होने में समय लगेगा। मेरी कोशिश होगी कि जितनी जल्दी हो सके फिट होकर हॉकी को फिर से गले लगा लूं।

साथी खिलाड़ियों को कितना मिस कर रहे हैं?

पिछले तीन-चार साल से जिनके साथ हमेशा रहा हूं, उन्हें तो मिस करूंगा ही। हां, संदीप सिंह, प्रभजोत, सरदारा सिंह और एड्रियन को ज्यादा मिस करूंगा। फिर इस चोट की वजह से टीम के साथ यूरोप टूर पर न जाने की कोफ्त भी है। 

होजे ब्रासा की कोचिंग से आप कितना सहमत हैं और कैम्प में वे किस बात पर ज्यादा जोर देते हैं?

ब्रासा को आए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है। हां, वे तकनीक पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। हर खिलाड़ी हर पोजीशन पर खेले इस पर उनका ज्यादा जोर है। अच्छे और अनुभवी कोच हैं। उनकी कोचिंग में टीम में क्या फर्क आता है यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

इतने कम समय में प्रमुख गोलकीपर बनने का राज?

मैं तो सिर्फ खेलना चाहता हूं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इतनी जल्दी टीम का प्रमुख गोलकीपर बन जऊंगा। हॉकी कभी मेरी प्राथमिकता नहीं थी। हां, मैं यह हमेशा चाहता हूं कि टीम के लिए अपना बेस्ट दूं। मेरा एक स्ट्रांग प्वॉइंट है कि मैं कभी हार नहीं मानता।

हॉकी खेलना कैसे शुरू किया?

घर में कोई हॉकी नहीं खेला। माता-पिता दोनों कबड्डी के खिलाड़ी थे। घर का माहौल ऐसा था इसलिए मेरा ध्यान भी खेलों की तरफ गया। गली-मोहल्ले में क्रिकेट खेलने के साथ-साथ मेरा हॉकी प्रेम भी जागा। जसबीर सिंह बाजवा ने मुझे हॉकी से रू-ब-रू कराया। 14 साल की उम्र में बाजवा ने मेरी प्रतिभा को पहचाना। हॉकी प्लेयर बनाने का सारा क्रेडिट मैं बाजवा सर को ही दूंगा।

गोलकीपर कैसे बने?

गोलकीपर कैसे बना इसकी बड़ी ही दिलचस्प कहानी है। 1993 की बात है। दिल्ली में नेहरू हॉकी टूर्नामेंट चल रहा था। मैं गुरु गोबिंद सिंह स्कूल की टीम का हिस्सा था। इस अंडर-16 टीम में मैं राइट विंगर था। गोलकीपर था राजबीर। एक मैच के दौरान राजबीर को चोट लगी और मुझे गोलपोस्ट की जिम्मेदारी सौंप दी गई। बस, उसके बाद मेरे नाम पर गोलकीपर की मुहर लग गई।

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