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जोरदार मुक्कों की महारानी

जोरदार मुक्कों की महारानी

मैरी कॉम देखने में किंगकांग नहीं हैं। चीते की तरह फुर्तीलीं। कोमल और लचीला शरीर। लेकिन पंच में ऐसी जान कि सामने वाला देखते-ही-देखते रिंग में चित्त हो जाये। वे दुनिया की ऐसी महिला बॉक्सर हैं, जिन्होंने विश्व महिला बॉक्सिंग प्रतियोगिता चार बार जीती हैं। चौथी बार जब वे चैंपियन बनीं, तो लोगों ने अपने दांतों में उंगली दबा ली। प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले वे दो साल तक रिंग से दूर थीं। इस दौरान उन्होंने दो जुड़वा बच्चों को भी जन्म दिया। अपने पति ओनलर और अपने बच्चों के साथ पारिवारिक जीवन जीती रहीं। लेकिन जब उनकी रिंग में वापसी हुई तो चौथी बार उन्होंने वह करिश्मा कर दिखाया, जो आज तक किसी ने नहीं किया है। आज उनके पास चार गोल्ड मैडल हैं। देर से ही सही अब उनके कारनामें को सम्मान देने का सरकार ने फैसला किया है। उन्हें भारत रत्न मिलना लगभग तय हो गया है। मैरी कॉम के बॉक्सर बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। बात उन दिनों की है जब बच्ची मैरी कॉम मणिपुर के एक मैदान में ब्वॉयज बॉक्सिंग देख रही थीं। तभी किसी ने उससे कहा कि ये लड़कों का खेल है। एक भी पंच तुम्हारी नाक में पड़ जायेगा तो तुम्हारी नाक टूट जायेगी। टूटी नाक वाली लड़की से कोई शादी नहीं करेगा। मैरी ने अपने शरीर पर कई पंच मारे और अपनी बॉडी को बाक्सिंग के लिये टेस्ट किया। आर्थिक तंगी के चलते मुक्केबाज बनने का उसका सपना उस समय पूरा नहीं हुआ। वह खेल से जुड़ी रहीं, जवलिन थ्रो और चार सौ मीटर दौड़ प्रतिस्पर्धाओं में वह भाग लेती रहीं। वहां ज्यादा कुछ नहीं कर सकीं। इसके बाद ही उसने बॉक्सिंग को अजमाने की सोची। जब वे रिंग में उतरीं तो एक के बाद एक मुश्किलें पार करते हुए वह इस मुकाम तक पहुंची। उन्होंने जवलिन थ्रो की ताकत को अपने पंच, दौड़ की ऊर्जा को रिंग में इस्तेमाल किया और नाक टूटने की बात को खारिज कर दिया। फिर अपने करियर के दौरान न जाने कितने मुक्केबाजों की नाक तोड़ी। मैरी कॉम का पूरा नाम मंगते चुंगनीजंग मैरी कॉम है। मणिपुर के चूड़ाचांदपुर जिले में एक मार्च 1983 में जन्मी मैरी की बचपन से ही खेलों में रुचि थी। यदि वह खिलाड़ी न होती तो वह गायिका होती। मैरी कहती हैं कि उन्हें संगीत से बहुत लगाव है। लेकिन मुक्केबाजी ने मेरे संगीत प्रेम पर ग्रहण लगा दिया। बच्चे पैदा करने के बाद बॉक्सिंग रिंग में मैरी की वापसी काफी चुनौतीपूर्ण थी। हलके वजन के बॉक्सरों के लिए अपना वजन संतुलित रखना सबसे मुश्किल काम होता है। उसने कड़ी मेहनत से अपने वजन को नियंत्रित किया। और अपने कोच अनूप कुमार की मदद से जोरदार वापसी की। चौथी विश्व चैंपियनशिप में उतरने से पहले वह अपना एशियाई चैंपियनशिप का खिताब बचाने के लिये रिंग में उतरीं। वह खिताब नहीं बचा सकीं। उन्हें सिलवर मैडल से ही संतोष करना पड़ा। लेकिन चीन में विश्व चैंपियनशिप में भिड़ने के लिये इस बीच उन्होंने गजब की तैयारी की और विश्व विजेता का अपना खिताब चौथी बार बचा लिया। रिंग में तो वह देशी विदेशी सभी मुक्केबाजों को पछाड़ चुकी हैं। लेकिन देश की नौकरशाही के अखाड़े में वह हर बार हार मान जाती हैं।

खेल रत्न के लिये उनका नाम हर बार प्रस्तावित किया जाता है लेकिन उन्हें आज तक यह अवॉर्ड नहीं मिल पाया है। वैसे उन्हें यह सम्मान मिले या न मिले, वे भारत की असली रत्न हैं।

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