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कोर्ट के चक्कर में फंसे कारगिल शहीद के माता-पिता

कोर्ट के चक्कर में फंसे कारगिल शहीद के माता-पिता

कारगिल में विजय हासिल करने की दसवीं वर्षगांठ पर देशभर में खुशियां मनाई जा रही है, लेकिन उड़ीसा के केंद्रपाड़ा के शहीद लांस नायक सच्चिदानंद मल्लिक के माता-पिता मुआवजे की धनराशि अपनी बहू से हासिल करने के लिए आज तक कचहरी कि चक्कर लगा रहे हैं।

सच्चिदानंद के देश पर प्राण न्योछावर करने के बाद सरकार तथा अन्य संगठनों ने इस शहीद के परिवार को 22.70 लाख रुपये दिए, लेकिन यह धनराशि सच्चिदानंद की पत्नी निवेदिता मल्लिक के खाते में चली गई पर निवेदिता ने अपने सास-ससुर को फूटी कौड़ी भी नही दी।

इससे परेशान होकर गरीब और अशक्त माता-पिता ने 1999 के दौरान केंद्रपाड़ा की सिविल बदालत में मुकदमा दाखिल किया। सात साल बाद 2006 में अदालत ने विधवा निवेदिता को मिले रुपये में से एक तिहाई धनराशि सच्चिदानंद की मां को दिए जाने का आदेश दिया।

अदालत ने कहा कि हिन्दू उत्तरधिकार अधिनियम 1956 के तहत मां भी मुआवजे की हकदार है। लेकिन इस फैसले के खिलाफ निवेदिता ने ऊपरी अदालत से स्थगन बादेश हासिल कर लिया हे।

शहीद सच्चिदानंद की मां मालती मल्लिका (75) ने बताया कि उनका बेटा 1989 में सेवा में बतौर सिपाही भर्ती हुआ था, बाद में उसे लांस नायक के पद पद प्रोन्नत कर दिया गया। सच्चिदालंद ने कारगिल युद्ध के दौरान थ्रेश सेक्टर में देश की रक्षा करते हुए 28 जून 1999 को अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

उन्होंने कहा कि सच्चिदानंद के शहीद होने के बाद से उसकी पत्नी ने मुआवजे। उसकी पत्नी मुआवजे की राशि मिलने के बाद गांव छोड दिया। ओर पिछले सात साल से गांव वापस नहीं आई है।

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