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नशाबंदी और शासन का नशा

काबुल की अंधेरी रात में सितारों को देखने का अलग ही मजा है, खासतौर पर तब जब आप वहां की किसी खुली छत वाले ऐसे बार-रेस्तरां में बैठे हों जो अच्छे खाने के साथ शराब भी परोसता है। काबुल के वजीर अकबर खाना इलाके में ऐसे ही एक बार को विनम्र स्वभाव वाले कलीम चलाते हैं। वे जानते हैं कि आधी रात को जब पत्रकारों को भूख-प्यास लगती है तो उन्हें क्या करना चाहिए। पांच साल से वे काबुल में हैं और यहां आने से पहले कलीम इराक में रेस्तरां चलाते थे, इसलिए आतंकवाद और पर्यटन दोनों के ही बारे में वे अच्छी तरह जानते हैं। वहां तैनात सुरक्षा सिपाहियों से कहा जाता है, बंदूके नीचे कर लें और अब आप अंदर जा सकते हैं।
गुजरात से खबर आई कि वहां गैरकानूनी तौर पर बिकने वाली जहरीली शराब पीने से 130 लोग मर गए तो मैंने शराब, धर्म और राज्यसत्ता के पाखंड के बारे में सोचना शुरू कर दिया। गुजरात विधानसभा में जब इस त्रासदी पर बहस की मांग की गई तो उसे ठुकरा दिया गया। फिर विरोध में फर्नीचर और माइक्रोफोन तोड़ने जैसी घटनाएं हुईं।

गुजरात भारत का अकेला ऐसा राज्य है जहां शराब पर पूरी तरह पाबंदी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यहीं पैदा हुए थे और वे मानते थे कि शराब बहुत सी समस्याओं की जड़ है। उन्हीं के सम्मान में पूर्ण शराबबंदी है। एक तरह से वे सही ही थे, देश के ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं कि शराब के मसले को जिम्मेदारी से कैसे निपटाया जाए। लेकिन यह देखकर मन द्रवित हो गया कि कैसे राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि शराबबंदी नहीं खत्म की जाएगी। खासकर इसलिए भी कि बाकी मामलों में उन्होंने गांधी जी के मूल सिद्धांतों को पूरी तरह नजरंदाज किया और 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगा होने दिया। इस दंगे में 3,000 लोग मारे गए थे। नरेंद्र मोदी यह भूल गए कि 1947 को जब भारत आजाद हुआ और नेहरू तिरंगा झंडा फहरा रहे थे तब गांधी नोआखली में सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने की कोशिश में जुटे थे।
लेकिन विडंबना यह है कि तमाम लोगों की जान लेने वाली इस त्रासदी के लिए मोदी ने सिर्फ औपचारिकता ही निभाई। इस बीच यह भी पता लगा है कि गुजरात सरकार ने केंद्र से मांग की है कि शराबबंदी के कारण उसे जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई के लिए केंद्र सरकार राज्य को हर साल 3,000 करोड़ रुपये की राशि दे।
लेकिन खुदा का खौफ खाने वाली सरकारें शराब के बारे में क्या करती हैं। कई इस्लामी देश इसे हराम मानते हैं। लेकिन यह देखना बड़ा दिलचस्प है कि उनमें से भी अलग-अलग देश अलग-अलग तरह से शराब के मसले से निपटते हैं। ग्रेप्सहिशा डॉट कॉम के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात में शराब पर एक ‘हराम’ टैक्स लगाया जाता है, लेकिन इससे उसकी कीमत उतनी ही रहती है, जितनी पश्चिम के देशों में। शारजाह में शराबबंदी है लेकिन दुबई में आपको तकरीबन हर जगह शराब मिल जाएगी। बस उसे बेचने के लिए लाइसेंस होना चाहिए। यहां तक कि रमजान के पवित्र महीने में आपको आबू धाबी तक में शराब मिल सकती है।
जाहिर है कि अरब अमीरात में शराब को लेकर समझदारी भरा रवैया अपनाया जाता है, और हां वहां शराब पीकर गाड़ी चलाना किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाता। सउदी अरब के रियाद में पूरी तरह शराबबंदी है। रियाद के बारे में एक चुटकुला सुनाया जाता है- एक राजनयिक ने भारी मात्रा में शराब आयात की, कस्टम द्वारा उससे पूछा गया कि इसमे क्या है तो उसने कहा कि फर्नीचर। कुछ समय बाद अधिकारियों ने उसे फोन करके कहा, ‘सर आपका फर्नीचर लीक कर रहा है’।
अफगानिस्तान के इस्लामी गणराज्य में भी पूरी तरह शराबबंदी है। आखिर यह ऐसा देश है, जो कुछ ही साल पहले तालिबान की सख्त गिरफ्त से मुक्त हुआ है। हालांकि अफगान अक्सर अपने घर के पर्दे में शराब पी लेते हैं। अफगानिस्तान धीरे-धीरे पाबंदी की मानसिकता से मुक्त हो रहा है। शराब पी जानी चाहिए या नहीं यह आज अफगानिस्तान में एक बहुत बड़ा मुद्दा है।
अफगानिस्तान खुद को एक नए राष्ट्र के रूप में ढाल रहा है, यहां काम करने वाले एनजीओ स्थानीय औरतों और आदमियों को प्रोत्साहित करने के लिए बार-बार पवित्र कुरआन का हवाला देते हैं, आजीविका के लिए भी और प्रशासनिक मामले में भी। ‘हैंड इन हैंड’ नाम के एक काम करने वाली ऊषा सोमसुंदरम बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के मॉडल पर अफगानिस्तान के गांवों में माइक्रोफाइनेंसिंग प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही हैं। वे बताती हैं कि उन्हें और उनकी टीम को अक्सर ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है। मसलन अक्सर वे मुनाफे के बारे में पूछते हैं, वे मानते हैं कि इस्लाम में इसके लिए कोई जगह नहीं। वे
अक्सर दिशा निर्देश के लिए पवित्र कुरआन की ओर देखते हैं। वे मानती हैं कि अफगान लोगों के लिए आस्था और आधुनिकता में कोई टकराव नहीं है, दोनों साथ चल सकते हैं।
इसके विपरीत पाकिस्तान एक आधुनिक इस्लामी राज्य है, जिसमें कई वैचारिक और इंसान के बनाए संकट हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण फौजी तानशाह जनरल जिया उल हक के समय पाकिस्तान में चला ‘इस्लामीकरण’ का अभियान था। जिया उल के शासनकाल में मजहब इंसान और खुदा के बीच रिश्ते से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया था। जिसका सबसे ज्यादा नुकसान औरतों को
झेलना पड़ा था। नशाबंदी वहां 1977 में ही लागू हो गई थी। पाकिस्तानी मुसलमानों को शराब पीने की इज्जत नहीं है, हालांकिमुशर्रफ के शासन में आने के बाद से मुरी की ब्रीवरीज़ का उत्पादन और बिक्री साल दर साल बढ़ रही है। गैर मुसलमानों मुख्यत: हिंदुओं और ईसाइयों को शराब के लिए परमिट मिलता है, जिससे वे हर महीने अधिकतम पांच बोतल शराब खरीद सकते हैं। परमिट के लिए भरे जाने वाले फॉर्म में पूछा जाता है- शराबी का नाम.., शराबी के पिता का नाम.. वगैरह- वगैरह।
जहिर है कि कट्टरता सिर्फ मजहब से पैदा नहीं होती, कई बार यह परंपरा और उन नियम कायदों से पैदा होती है जो समाज और लोगों पर शासन करने के लिए बनाए जाते हैं।

jomalhotra@gmail.com
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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