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बुरा मानो या भला: हम कभी नहीं सीखेंगे

किसी किताब को बेस्ट सेलर बनाने का एक ही तरीका है कि उस पर सरकार से पाबंदी लगवा दो। या यह अफवाह उड़वा दो कि पाबंदी लगने वाली है। डी. एच. लॉरेन्स के ‘लेडी चैटरर्ली लवर्स’ के साथ यह हुआ था। हाल ही में सलमान रुश्दी के ‘सैटनिकवर्सेज’ के साथ भी यही हुआ।

किसी भी चीज को बेचने का यह गजब का तरीका है। इसीलिए बहुत सारे लोग पाबंदी लगवाने के काम में लगे रहते हैं। शराबबंदी का मामला इतिहास जितना ही पुराना है। हां, सिगरेट-बीड़ी पीने पर पाबंदी का मामला नया है। लेकिन जहां कहीं भी इन पर पाबंदी लगाने की कोशिश हुई है, हमेशा फ्लॉप ही रही है। अमेरिका सालों साल शराब पर पाबंदी लगाता रहा। फिर उन्होंने महसूस किया कि उसका कोई मतलब नहीं है। हिंदुस्तान में भी अलग-अलग राज्यों ने पाबंदी की कोशिश की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। उन्हें समझ में आ गया कि चाहे जितना कड़ा कानून बना दो, लोगों को अगर पीना है तो पिएंगे ही। अगर उन्हें कानूनन नहीं मिलेगी तोगैरकानूनी तरीकों से पिएंगे। कच्ची शराब ही पी जाएंगे चाहे, उससे उनकी जान ही चली जए। अपने यहां गुजरात ऐसा राज्य है, जो कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है। कोई हैरत की बात नहीं कि पिछले महीने ही जहरीली शराब पीने से 150 से ज्यादा लोगों कीजानें चली गईं।

शराब पीने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन शराबी होने में है। दुनियाभर में बड़े लोगों को शराब पीने की मंजूरी है। वे जब चाहें पी सकते हैं। दिक्कत तब होती है, जब वे धुत्त हो जाते हैं और बदतमीजी करने लगते हैं। तभी उन्हें गिरफ्तार भी किया जाता है। आप भलेआदमी या औरत की तरह पिएं, वो तो तहजीब की निशानी है। उससे तो रिश्तों में मजबूती आती है। अगर इंग्लैंड के सारे पब बंद हो जएं, तो वहां की जिंदगी उबाऊ हो जएगी। पूरे यूरोप में वाइन बनाना एक कला है। वहां तो घर-घर में उसे बनाया जाता है। दोनों वक्त के खाने पर वे वाइन पीते हैं। वहां उसे कोई खराब नहीं समझता। हिंदुस्तानी तो वैदिक काल से पहले से ही पी रहे हैं। वो शराब अमूमन घर पर ही बनी होती थी। या छोटे-मोटे धंधों के तौर पर बनाई जती थी। अरक, महुआ, ठर्रा, फेनी वगैरह। यूरोपीयों के आने के बाद वह बड़े उद्योग-धंधों में बदली। तब हमने बीयर, व्हिस्की, रम और जिन वगैरह के नाम सुने। पिछले सालों में हमने भी वाइन बनानी शुरू कर दी है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में कई वाइनयार्ड हैं। तो हमारी अपनी भी अब रेड, व्हाइट और रोज वाइन है। अपनी शैंपेन भी। अपने कई ब्रैंड तो दुनिया में किसी से टक्कर ले सकते हैं। वे विदेशी मुद्रा भी कमा रहे हैं। कमा सकते हैं। हमारा मकसद बेहतरीन शराब बनाना होना चाहिए। उसमें एल्कोहल की मात्रा कम हो। वह सस्ती भी हो ताकि आम आदमी भी उसका मजा ले सके। लेकिन क्या हमारे बेवकूफ नेता कभी कोई सबक सीखेंगे?

चंचला देवी
उस दिन मेरी पड़ोसी रीता देवी वर्मा का फोन आया। उन्होंने झिझकते हुए पूछा, ‘क्या मैं अपनी दोस्त को आपसे मिलाने ला सकतीहूं? वह जानती हैं कि मुझे अजनबियों से दिक्कत होती है। इसीलिए वह झिझक रही थीं। ‘बस पांच मिनट के लिए! आपको मिल कर अच्छा लगेगा।’ थोड़ी देर में ही वह एक छोटे से काले-सफेद झबरे कुत्ते को ले कर चली आईं। ‘यह चंचल है। यह मुझे सड़कपर मिली। इसका पैर टूट गया था।’ मैंने सोचा कि ओह ये है। अपने नाम के मुताबिक ही वह चंचल रहती है। लगातार अपनी पूंछहिलाती है। उसने मेरे पूरे घर को छान मारा। मेरी टांगें वगैरह सूंघ डालीं। मैंने उस पर हाथ फेरा। वह मेरे हाथ को चाटती रही। रीता बताती रहीं, ‘मैंने इसे सड़क पर कराहते देखा था। उसके खून निकल रहा था। एक कार उसे टक्कर मार गई थी। मैं उसे खान मार्किट में ‘वट’ के पास ले गई। वह उसे छोड़ देने को कह रहा था। लेकिन मैं तैयार नहीं हुई। मैंने कहा, ‘इसकी मरहम पट्टी करो। मैं इसे अपने साथ ले जाऊंगी।’ वह उसे अपने घर ले गईं। दिन रात उसकी सेवा की। वह ठीक हो गई। उनकी दोस्त ने सलाह दी किउसका नाम होप या आशा रखना चाहिए। लेकिन वह हर वक्त बेचैन रहती थी। इसीलिए रीता ने उसका नाम चंचल रखा। मैंने उसे चंचला देवी कर दिया। कुछ वक्त में ही मुझे उससे प्यार हो गया। मैं उसे कुछ न कुछ खिलाने लगा ताकि वह फिर आए। वह भी खुश नजर आ रही थी। मैंने एक और ‘गर्ल फ्रेंड’ बना ली थी।

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