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अब न मांगेंगे रामबोला

तुलसी जयंती आ रही है। इसी मंगलवार को सावन शुक्ल सप्तमी है। इसी दिन गोस्वामी तुलसीदास का जन्म हुआ था। और ठीक उसी दिन से उनका दुर्भाग्य शुरू हो गया था। पैदा होते ही उनकी मां चल बसी थीं। पिता आत्माराम उस अभागे को देखना भी नहीं  चाहते थे। लिहाजा उन्होंने उसे गांव से बाहर फेंक आने को कह दिया था। वह एक भिखारिन के घर पले। एक दिन भिखारिन मां भी छोड़ कर चल दीं। भटकते और भीख मांगते जब अति हो गई, तो वह गांव छोड़ कर चल दिए। एक हनुमान मंदिर में उन्हें शरण मिली। और उन्होंने तय कर लिया कि अब तो वह जो कुछ भी मांगेगे, हनुमान जी से ही मांगेंगे। किसी और के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।
उनका बचपन का नाम रामबोला था। न जाने किसने उनका नाम रामबोला रखा था। लेकिन कितना सटीक था वह नाम। राम की भक्ति में ही उनका जीवन बीता। रामबोला से तुलसी बनाया था नरहरि बाबा ने। उन्हीं के हनुमान मंदिर में आकर रामबोला रहे थे। वही उन्हें अयोध्या ले गए और बाद में काशी। रामबोला से तुलसीदास की यात्रा नरहरि बाबा के बिना नहीं हो सकती थी।

अपने जीवन में उन्हें जो भी पहचान मिली, वह राम से ही मिली। लेकिन राम तक वह पहुंचे हनुमान जी के सहारे। बचपन में वह अक्सर दुखी हो कर कहा करते थे, हनुमान बाबा हमें रामजी के दर्शन करा दो। रामजी तक पहुंचा दो। हनुमान बाबा से उनका बचपन में जो रिश्ता बना वह आखिर तक बना रहा। अत अद्भुत रिश्ता था उनका अपने हनुमान बाबा के साथ। बचपन में तो उन्हें हनुमानजी के बंदर ही कहा जाता था। शायद उसी रिश्ते की वजह से वह ‘हनुमान बाहुक’ लिख सके। अपने देवता को कोई कितना प्यार औरकोस सकता है? उसकी मिसाल है यह रचना। यह संयोग नहीं है कि अपनी पहली बड़ी रचना उन्होंने ‘हनुमान चालीसा’ के रूप में की। कभी अपने ही भीतर बैठे डर को मिटाने के लिए उनके मुंह से निकला था, ‘भूत पिशाच निकट नहिं आवे, महावीर जब नाम सुनावे।’ धीरे-धीरे हनुमान बाबा में उनकी आस्था इतनी बढ़ी कि वह हनुमान चालीसा का आधार बनी। महान ‘रामचरित मानस’ के बीज यहीं कहीं से पड़ने शुरू होते हैं।

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