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रुतबे की सुरक्षा

वीआईपी सुरक्षा कम किए जाने की एक और कोशिश नेताओं ने नाकाम कर दी। इसकी वजह यह नहीं है कि नेताओं के लिए खतरा बढ़ गया है बल्कि यह है कि सुरक्षा का तामझाम नेताओं के लिए रुतबे का सूचक बन चुका है और पुराने इंतजाम में कोई भी कमी उन्हें अपने ओहदे में कमी जैसी लगती है। पिछले सालों में आतंकवाद की वजह से और दो प्रधानमंत्रियों की हत्या की वजह से सुरक्षा इंतजाम कम करना चाहने वाले गृहमंत्री या आला अफसर भी कोई ऐसा खतरा नहीं उठाना चाहते, जिससे उनके सिर पुन: ठीकरा फूटे। हालांकि ऐसे भी कई नेता बहुत भारी सुरक्षा इंतजामों में रहते हैं, जिन्हें आतंकवाद से कोई खतरा नहीं है। ऐसे नेता जरूर हैं, जिनकी सुरक्षा की जरूरत है, लेकिन वे ज्यादा असुरक्षित हों ऐसा भी नहीं है। वीआईपी सुरक्षा का मामला गंभीर इसलिए है कि यह सीधे-सीधे आम जनता की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। जरूरी यह है कि देश में आमतौर पर सुरक्षा का इंतजाम हो, लेकिन पुलिस में सुधार या दूसरी सुरक्षा एजेंसियों को बेहतर बनाने में इन नेताओं की कोई रुचि नहीं है। जैसे-जैसे देश की सुरक्षा व्यवस्था लचर होती जाती है, नेता अपनी निजी सुरक्षा बढ़ाते चले जाते हैं। नेताओं की विशेष सुरक्षा और आमतौर पर सुरक्षित माहौल न होने का सीधा-सीधा संबंध है। एक ओर पटना में पुलिस थाने से थोड़ी दूर पर दिन दहाड़े एक महिला के कपड़े फाड़े जाते हैं, हरियाणा में अदालत और पुलिस से सुरक्षा पाए एक नौजवान की हत्या कर दी जाती है दूसरी ओर नेता अपना ताम-झाम कम न करने के लिए लड़ने पर उतारू होते हैं। दरअसल, सुरक्षा इन नेताओं के सामंती तौर-तरीकों को व्यक्त करती है। जैसे राजा-महाराज आगे-पीछे हाथी-घोड़े, सिर पर छत्र लिए सेवक वगैरा लेकर चलते थे, वही भूमिका अब काले कपड़े पहने, हथियार लिए कमांडो अदा करते हैं। लेकिन सुरक्षा के शोभा की वस्तु बन जाने का बुरा असर भी सुरक्षा एजेंसियों पर पड़ता है। समाज का ज्यादा लोकतांत्रिक और सुरक्षित होना वीआईपी सुरक्षा के तर्कसंगत होने से जुड़ा है, लेकिन हमारे नेता क्या ऐसा समाज चाहते हैं?

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