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बिहार भले ही शर्मसार हो मगर उन्हें शर्म नहीं आती

पटना के एक्जीविशन रोड पर एक महिला को अर्धनग्न करने की घटना को लेकर बिहार पहली वार शर्मसार नहीं हुआ बल्कि संगठित हिंसा और बर्बरता की पहली शिकार बार-बार यहां की महिलाएं होती रही हैं और बिहार का सर हमेशा शर्म से झुकता रहा है।


6 अगस्त 2006 की आधी रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा थाने के रामनगर गांव में चार अतिपिछड़ी जाति की महिलाओं के साथ स्थानीय सामंतों  द्वारा सामूहिक बलात्कार की घटना को अंजाम दिया गया। घटना के तत्काल बाद पूरे गांव के लोग अपनी शिकायत दर्ज कराने स्थानीय थाना पहुंचे। पुलिस ने मामला दर्ज कर कार्रवाई करने के बजाय उल्टे पीड़ितों को डरा धमका कर भगा दिया था। इस घटना के विरोध में स्थानीय प्रशासन से गुहार लगाने से लेकर लखीसराय-मुंगेर पथ को विरोध में जाम किया गया। बात बनी नहीं और पीड़ित परिवार के परिजनों को ही उल्टे पुलिस दमन का शिकार बनना पड़ा था।


देश भर के मानवाधिकार से जुड़े संगठनों ने लखीसराय का रुख किया और एक सप्ताह बाद संसद भवन के सामने पीड़ित महिलाओं के साथ जमकर प्रतिरोध मार्च किया। घटना के 16 दिनों बाद वे सभी महिलाएं 22 अगस्त को मुख्य मंत्री के जनता दरबार में उपस्थित हुईं और अपनी आपबीती सुनाई। इसके बाद मुख्यमंत्री के आदेश पर पटना से ही प्राथमिकी दर्ज करायी गई। इस मामले की प्रगति यह है कि इस घटना के एक भी नामजद अभियुक्त की गिरफ्तारी आज तक नहीं हुई। तीन साल पहले लखीसराय में तथा गुरुवार को  पटना में बिहार को शर्मसार करने वाली घटना में एक बात समान है कि दोनों ही घटना के वक्त जिले की कमान श्रीमती आर एम विलि के हाथों में थी।


इसी तरह पहली जनवरी 2003 को नया वर्ष मनाने का जुनून इसी जिले के तबाही मचाने वाले रंगदारों पर सवार हुआ। उन्होंने बड़हिया प्रखंड के डुमरी पंचायत के गोपालपुर गांव में पिछड़ी जाति की 14 महिलाओं को उठा लिया और उनमें से सात कम उम्र की महिलाओं को चुनकर ले गए और सात को छोड़ दिया। अपने साथ ले गए सात महिलाओं को अपने हवस का शिकार बनाया और विरोध करने वाली महिलाओं की चमड़ी उधेड़ दी।

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