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हिन्दी अकादमी में नियुक्ति पर विवाद गहराया

हिन्दी अकादमी में नियुक्ति पर विवाद गहराया

हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य कवि अशोक चक्रधर को हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाए जाने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। हिन्दी के कई लेखकों ने अब अकादमी को स्वायत्त बनाने तथा सरकारी नियंत्रण को समाप्त करने की मांग की है।

अकादमी की संचालन समिति की सदस्य अर्चना वर्मा के इस्तीफे के समर्थन में हंस के संपादक और प्रसिद्ध लेखक राजेन्द्र यादव, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व उपाध्यक्ष रामशरण जोशी, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कवि मंगलेश डवराल और समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से चक्रधर की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने की मांग की है।

इस बीच, जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष एवं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मैनेजर पाण्डेय तथा वरिष्ठ हिन्दी कवि केदारनाथ सिंह ने हिन्दी अकादमी को स्वायत्त बनाने की मांग की है और साहित्य अकादमी की तरह उसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की नियुक्ति चुनाव से कराने की मांग की है।

गौरतलब है कि हिन्दी अकादमी का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है और उपाध्यक्ष की नियुक्ति दिल्ली सरकार करती है चक्रधर से पहले सर्वश्री मुकुंद द्विवेदी, नामवर सिंह, स्वर्गीय हरभजन सिंह, जनार्दन द्विवेदी तथा कुलनंद भारतीय जैसे लोग इसके उपाध्यक्ष रह चुके हैं।

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि देश की सभी साहित्यिक एवं कला संस्थाओं को स्वाधीन और स्वायत्त होना चाहिए है। उन्हें राज्य सरकार से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए, लेकिन देश के सभी राज्यों में ऐसा नहीं है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में भी जहां वामपंथी सरकारें रही है।
 
पाण्डेय ने कहा कि अकादमी को पूरी तरह स्वायत होना चाहिए। दीक्षित को चाहिए कि वे उसे राजनीतिक छाया से मुक्त रखें, लेकिन देखा यह जाता है कि सरकार अपने राजनीतिक चहेतों को नियुक्ति कर ली है। पंकज बिष्ट ने कहा कि साहित्य की संस्थाओं में जनता का पैसा लगा होता है। इसलिए हम लेखकों को यह सवाल उठाने का अधिकार है कि अकादमियों का कामकाज कैसे चल रहा है और किन लोगों की नियुक्ति की जा रही है।

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