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तीज त्योहारां बावड़ी.....

तीज त्योहारां बावड़ी.....

कहते हैं संसार में सावन के सौंदर्य से सुंदर कुछ भी नहीं है। गर्मी में झुलसी प्रकृति मानों बारिश की बूंदों में नहा कर एक बार फिर से नवयौवन हासिल कर लेती है, ताकि वह भी तीज के साथ शुरू होने वाले त्योहारों के सिलसिले में अपने पूरे श्रंगार के साथ भाग ले सके। आज उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, छत्तीसगढ़, राजस्थान समेत देश के विभिन्न राज्यों में तीज प्रेम, मस्ती और श्रंगार के विभिन्न रूपों में मनाई जा रही है। समय के साथ इस त्योहार को मनाने के ढंग में काफी अंतर आ गया है। हर नई पीढ़ी के हाथों में तीज नए मायने हासिल कर रही है। छोटे गांव व शहरों की तीज की पारंपरिक सादगी बड़े शहरों में सिमट सी गई है। व्यस्त जीवनशैली, छोटे परिवार और प्रदर्शन की प्रवृत्ति ने इस त्योहार को घर, मंदिर, बाग-बगीचे से निकाल कर बाजार और बड़े-बड़े हाट-बजारों और क्लबों द्वारा कराए जाने वाले मेलों तक सीमित कर दिया है।  फिर भी मस्ती के इस त्योहार की छटा आने वाले कई दिनों तक आपको देखने को मिलेगी ही।

हर रंग है निराला
हरियाणा, उत्तर प्रदेश या राजस्थान हर जगह की तीज का रंग अलग और निराला है। दिल्ली में पीतमपुरा में रह रही 50 वर्षीय सुषमा गुप्ता कहती हैं, ‘मेरा जन्म जींद में हुआ था और वहीं शादी भी हुई। हरियाणा में यह त्योहार व्रत-पूजा से कहीं अधिक महिलाओं की मस्ती और श्रंगार से जुड़ा रहा है। पहले तीज एक दिन तक सीमित नहीं होती थी। सावन भर बाग-बगीचों में पेड़ पर झूले पड़े रहते थे। महिलाएं इकट्ठी होकर झूले झूलने जाती थीं। गीत गाए जाते थे। घरों में दूध को काढ़ कर जवों यानी सेवईयों की खीर बनाई जाती थी। शादीशुदा बेटियों के यहां सिंगारा भेजा जाता था। सास, बहुओं को वस्त्र व श्रंगार का सामान देती थी। नव-विवाहिताएं पहली तीज मायके में अपनी सहेलियों के साथ मनाती थीं, पर आज बहू और मेरी दो बेटियां त्योहार को अपने ढंग से मनाती हैं। मेकअप करती हैं, मेहंदी लगाती हैं और सेलिब्रेशन के नाम पर मन-मुताबिक डिजाइनर कपड़े की शॉपिंग कर लेती हैं। बहुत हुआ तो सामाजिकता के नाते क्लबों द्वारा आयोजित तीज मेलों में चली जाती हैं।’

कामकाजी महिलाओं के लिए तीज सेलिब्रेशन के क्या मायने हैं, इसके जवाब में ब्रज में पली-बढ़ी और दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ रही 35 वर्षीय कनिका कहती हैं, ‘शादी से पहले तीज पर हमारे घर में ही नहीं, शहर भर में रौनक देखने को मिलती थी। मथुरा-वृंदावन में राधा-कृष्ण की मूर्तियों को मोगरे और बेला के फूलों और पत्तियों से सजे हिंडोलों में बैठा कर झुलाया जाता था।’ मुस्कराते हुए कनिका कहती हैं, ‘भले ही मेरी व्यस्तताएं और शहरी जीवनशैली उस अंदाज में तीज मनाने का अवसर नहीं देती, पर मेरी कोशिश होती है कि मैं बच्चों के साथ तीज सेलिब्रेट करूं। घर के बरामदे में बच्चों के लिए झूला डालती हूं।  शाम को पड़ोस के बच्चे और महिलाएं भी इकट्ठे हो जाते हैं।’

बेटियों को लाड़
राजस्थान क्लब से जुड़ी वंदना पोद्दार कहती हैं, ‘हमारे यहां तीज दो बार मनाई जाती है, पहली सावन के महीने में, जिसे छोटी तीज कहते हैं और दूसरी राखी के बाद, जिसे बड़ी तीज कहते हैं। छोटी तीज अधिक प्रसिद्ध है। ग्रीष्म तु के बाद त्योहारों की कड़ी में तीज पहला त्योहार है, जिसके बाद से त्योहारों की झड़ी लगनी शुरू हो जाती है, इसलिए कहा जाता है, तीज त्योहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर। हमारे यहां इसे बेटियों के लाड़ लड़ने वाला दिन माना गया है। माता-पिता अपनी विवाहित व अविवाहित लडकियों को सिंधारा देते हैं। लडकियां भगवान शंकर व पार्वती की पूजा करती हैं। जयपुर की तरफ गांवों में हरे रंग की चूडियां  और साडि़यां व ओढनी ओढ़ महिलाएं तीज की सवारी में लोकगीतों की  झड़ी लगा देती हैं। दो से तीन दिन चलने वाले मेले में सजे हुए हाथी, ऊंट, बैलगाडिम्यां, लोक-नृत्य करती महिलाएं व पुरुष सभी कुछ रोमांचित करने वाला होता है।’

उम्र और जाति की कोई सीमा नहीं
साहित्यकार चित्रा मुद्गल कहती हैं, ‘किसी भी त्योहार के दो पक्ष होते हैं। एक पक्ष रूढि़यों और व्रत-नियमों के पालन से जुड़ा है और दूसरा लोक-संस्कृति से। बड़े शहरों में आज स्त्रियां त्योहारों से संबंधित व्रत-नियम कायदों के प्रति पहले की तरह रूढ़ नहीं है। भले ही अपनी व्यस्तताओं व जीवन-शैली के कारण व्रत नहीं रखतीं या तीज के बारे में नहीं जानतीं, फिर भी तीज मेलों में शामिल होना, खाना-पीना, शॉपिंग करना, हाथों में मेहंदी लगाना उन्हें अच्छा लगता है। तीज खुशी व मस्ती का त्योहार है। यदि लोक-सांस्कृतिक पक्ष को मजबूत बना पूरा परिवार तीज को मनाता है तो यह वाकई खुशी की बात है। वैसे भी प्रेम और शुभकामना को तो किसी भी रूप में व्यक्त किया जा सकता है।’

आज सावन के स्वागत और सुहागिनों के श्रंगार व मस्ती का त्योहार है। सुहागिनें सज रही हैं, मानो रूठे हुए सावन को मनाने का प्रयास कर रही हों। बाजार और तीज उत्सव में बड़े-बडे़ क्लब और होटल-हाट भी सजे हैं। हर नई पीढ़ी के हाथ तीज नए मायने हासिल कर रही है, फिर भी स्त्रियों के मेहंदी और लाल-हरी चूडि़यों  से सजे हाथ और मीठे पकवान खाने-खिलाने की परंपरा आज भी जारी है।

लीना सिंह, फैशन डिजाइनर
हमारे परिवार में तीज नहीं होती, पर मुझे तीज में होने वाले आयोजनों में शामिल होना अच्छा लगता है। राजस्थान और मारवाड़ी सहेलियों के यहां तीज के भव्य आयोजनों में कई बार शामिल हुई हूं। कलरफुल साडि़यां, झूला, मेहंदी, चूंडि़यां सभी कुछ मन को मोहने वाला होता है। तीज बारिश से जुड़ी मस्ती का त्योहार है, जिसमें झूला  त्योहार की स्पिरिट को और लाइव बना देता है।

वाणी त्रिपाठी,
टीवी कलाकार
वर्षा में चारों ओर हरियाली होती है और प्रकृति जीवंत-सी हो उठती है। उसी तरह तीज भी नारी शक्ति और प्रेम के खुशनुमा एहसास के विभिन्न रंग अपने में समेटे हुए है। मेरी मां राजस्थान से हैं। आज भी वहां तीज बहुत ही सुंदर और परंपरागत तरीके से मनाई जाती है। कुछ समय पहले तक हमारे यहां तीज पर राजस्थान के लोक गायकों द्वारा अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे। आज भी मैं तीज पर घेवर, उसके साथ कई तरह का नमकीन और ठंडाई का मजा लेना नहीं भूलती। जहां तक होटलों और हाट-बजारों के तीज मेलों की बात है तो यह संपन्न वर्ग तक ही सीमित है। पारंपरिक सादगी अवश्य ही कम हुई है।

संगीता गौड़, शास्त्रीय गायिका
तीज का पूरा त्योहार प्रकृति, प्रेम, मिलन और विरह के भावों से जुड़ा है। पीढ़ी दर पीढ़ी तीज में आ रहे बदलावों का एक कारण सिमटते परिवार और बढ़ती व्यस्तता है। अब  समय की कमी है तो अपनत्व की भी। तीज के अवसर पर हवेली संगीत, पद गायन, कजरी, झूमन, मल्हार व हिंडोले गीत सुनने को नहीं मिलते। आज कहां तीज के अवसर पर सुनने को मिलते हैं राधे झूलन पधारो, घिर आए बदरा या फिर घिर आई काली बदरिया, राधे बिन लागे न म्हारो जिया।

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