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कौन करेगा प्रसार भारती की सर्जरी

जमाना टेलीविजन का है- लेकिन हमारा प्रसार भारती पूरी दुनिया में कामयाबी के झंडे गाड़ चुके एबीसी, बीबीसी और सीबीसी जसे (पब्लिक ब्रॉडकास्टर) टीवी चैनलों की तरह अपनी छाप तक नहीं छोड़ पाया है। प्रसार भारती के गठन के 12 साल बाद भी दूरदर्शन उबाऊ, थकाऊ और मंद-कमाऊ बना हुआ है, जबकि ‘कलर्स’ जसे प्राइवेट चैनल ने महज एक साल में अपना रंग जमा लिया है। इसकी वजह है प्रसार भारती को सरकारी बेड़ियों से आजद कराने और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनाने की राह में आने वाली अड़चनें। इन्हें कैसे दूर करें, ये जानने के लिए ‘हिन्दुस्तान’ ने प्रसार भारती के इतिहास को खंगाला और इससे नजदीक से जुड़े रहे भास्कर घोष जसे इनसाइडर्स से बातचीत भी की। हमारे विशेष संवाददाता अमिताभ पाराशर का निष्कर्ष है कि सरकारी इच्छाशक्ति का अभाव ही इस मर्ज की मूल वजह है। 

हर नए सूचना व प्रसारण मंत्री का पहला एजेंडा होता है- ‘दूरदर्शन और प्रसार भारती को दुरुस्त करना है।’ यही रट प्रसार भारती के नए सीईओ या दूरदर्शन के नए महानिदेशक लगाते रहे हैं। लेकिन बीते वर्षो में न तो प्रसार भारती में कोई बड़ा बदलाव आया है, और न ही दूरदर्शन में। बल्कि स्थितियां बद से बदतर ही हुई हैं। इससे न केवल दर्शकों का मोहभंग होता रहा है बल्कि विज्ञापनदाताओं की रुचि भी कम होती जा रही है।

आज दूरदर्शन केवल सुदूर इलाकों में रहने वाले उन लोगों का चैनल बन कर रह गया है जहां केबल टीवी उपलब्ध नहीं है। जसा कि प्रसार भारती की एयर टाइम कमेटी ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष पी. एस. देवधर कहते हैं,‘यह अपने घिसे-पिटे कानूनों में ही उलझ रह गया। प्रसार भारती पूरी तरह से एक दिशाहीन तंत्र है।’ जिस प्रसार भारती के पास दूरदर्शन और आकाशवाणी को नियंत्रित करने का काम है, वह खुद इन दिनों आपसी लड़ाई में उलझी है। मौजूदा सीईओ बी. एस. लाली पर प्रसार भारती के कई सदस्य आर्थिक अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगा चुके हैं, और अध्यक्ष अरुण भटनागर भी आरोपों का समर्थन करते हैं, लेकिन सूचना व प्रसारण मंत्रालय मूक दर्शक बनकर देख रहा है।

प्रसार भारती का गठन दूरदर्शन व आकाशवाणी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के इरादे से किया गया था। 29 जून 1989 को प्रसार भारती एक्ट पहली बार लोकसभा में तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री पी. उपेन्द्र के समय में पेश किया गया। जुलाई 1990 में संसद ने इसे पारित किया और उसी साल सितंबर में इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली। लेकिन इसे अधिसूचित इसलिए नहीं किया गया क्योंकि कांग्रेस सरकार, जिसने इसके बाद तुरंत सत्ता संभाली, का मानना था कि देश में सैटेलाइट चैनलों के प्रादुर्भाव के संदर्भ में प्रसार भारती एक्ट में कई संशोधनों की दरकार है। प्रसार भारती अधिनियम (एक्ट) को संसद में पारित होने के सात साल बाद अधिसूचित कर कानून का रूप 1997 में दिया गया। इस कानून ने सरकारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (दूरदर्शन और आकाशवाणी) को स्वायत्तता प्रदान की,  लेकिन यह स्वायत्तता कागजों पर ही बनी रही, क्योंकि केन्द्र सरकार का दखल हर स्तर पर बना रहा। दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक भास्कर घोष कहते हैं,‘प्रसार भारती एक्ट का सेक्शन 22 कहता है कि केन्द्र जब चाहे, प्रसार भारती को कोई निर्देश दे सकता है और प्रसार भारती के लिए उसे मानना बाध्यता होगी। ऐसे में प्रसार भारती स्वायत्त कैसे रह सकता है?’

1997 के मौलिक प्रसार भारती एक्ट की समीक्षा के लिए 2001 में बनी किरण कार्णिक, शुनु सेन और नारायण मूर्ति की तीन सदस्यीय समिति ने जून 2002 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि प्रसार भारती की वास्तविक स्वायत्तता के लिए इसे अगले 5 साल में वित्तीय दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। यह रिपोर्ट आज तक धूल फांक रही है। इसी समिति ने डीडी 1 में  ढांचागत बदलाव और बंद हो चुके डीडी 2 चैनल को पूरी तरह से कमाई का जरिया बनाते हुए इसे प्रतिस्पर्धा में खड़े होने की जरूरत की बात कही थी। लेकिन ये रपटें कहां हैं, किसी को नहीं मालूम।

घटती लोकप्रियता

टीवी चैनलों की लोकप्रियता नापने वाली एजेंसी टैम के  नवीनतम आंकड़े कहते हैं कि 5 जुलाई से लेकर 12 जुलाई 2009 के बीच देश के जो 100 सबसे अधिक लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम थे, उनमें दूरदर्शन का एक भी नहीं था। अगर यह मान लें कि टैम के आंकड़ों के आधार शहरों के दर्शक हैं तो दूरदर्शन की इस दलील को माना जा सकता है कि दूरदर्शन सुदूर गांवों और कस्बों में लोकप्रिय है। लेकिन क्या इसकी उपलब्धि सिर्फ यही होनी चाहिए? 

दूरदर्शन और आकाशवाणी की कमाई

दूरदर्शन आज तक वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं बना है। 2008-09 में इसका कुल राजस्व 737.05 करोड़ रुपये था जो पिछले साल के इसके राजस्व (724.42 करोड़ रुपये) से ज्यादा है। लेकिन ऑपरेशनल कॉस्ट 1152.42 करोड़ रुपये है। व्यापार की दृष्टि से देखें तो 2008-09 में 400 करोड़ रुपये से अधिक घाटे में था। जबकि एक साल पहले शुरू हुए निजी चैनल कलर्स की  पहली और दूसरी तिमाही की कमाई के हिसाब से उम्मीद है कि 2008-09 में इसका राजस्व 500 करोड़ रुपये से ऊपर होगा।

एफएम रेडियो के सुनने वालों के 75 प्रतिशत हिस्से पर कब्जे करने का दावा करने वाले आकाशवाणी की कमाई 2008-09 में सिर्फ 208 करोड़ थी, जो कि पिछले वित्त वर्ष में इसके 233 करोड़ रुपये के राजस्व के करीब 10 प्रतिशत कम था। आकाशवाणी 232 रेडियो स्टेशन चलाता है जिसमें से 171 एफएम स्टेशन हैं। देश भर में स्थित निजी एफएम चैनलों की संख्या 242 हैं और 2008-09 में इनकी कुल कमाई 632 करोड़ रुपये थी। पी.एस. देवधर कहते हैं, ‘कई शहरों में आकाशवाणी के स्टेशन लोकप्रिय हैं, लेकिन मार्केटिंग के मामले में यह पीछे रह जता है।’ लगभग 40,000 कर्मचारी और 70,000 करोड़ से अधिक की परिसंपत्ति वाले प्रसार भारती के पहले अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार निखिल चक्रवर्ती थे। उनके निधन के बाद प्रो. यू.आर. राव और फिर 2003 में एम.वी. कामथ अध्यक्ष बने। कामथ पर संघी होने के आरोप थे, इसलिए यूपीए सरकार ने अध्यक्ष का कार्यकाल घटाकर 3 साल और अवकाश प्राप्त करने की उम्र 70 साल कर दी। कामथ 85 के थे। उनकी जगह मौजूदा अध्यक्ष अरुण भटनागर ने ली। इससे पहले एनडीए ने प्रसार भारती केअध्यक्ष एस.एस. गिल और सदस्य इतिहासकार रोमिला थापर और साहित्यकार राजेन्द्र यादव को हटा दिया था। अब मौजूदा अध्यक्ष भटनागर और सीईओ बीएस लाली में जंग चल रही है। 

क्या है लड़ाई?

कुछ महीने पहले प्रसार भारती बोर्ड के तीन सदस्यों जॉर्ज वर्गीज, आर.एन. बिसारिया और सुनील कपूर ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर कहा कि वे प्रसार भारती में चल रही गड़बड़ियों की अविलंब जांच कराने के आदेश जरी करें। बोर्ड के सदस्य (वित्त) ए.के. जन ने सबसे पहले लाली की कथित वित्तीय गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाई थी, जबकि बोर्ड के एक अन्य सदस्य वी. शिव कुमार ने भी जांच की भी मांग की थी।

प्रसार भारती अध्यक्ष का इस्तीफा व वापसी

चुनाव के ठीक पहले प्रसार भारती अध्यक्ष अरुण भटनागर ने त्यागपत्र दे दिया पर चुनाव के बाद इसे वापस ले लिया गया। दिल्ली हाईकोर्ट में बी.एस. लाली को सरकार द्वारा दिए गए 3 साल के सेवा विस्तार के खिलाफ जनहित याचिका दायर की गई है। इसकी सुनवाई के संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपने हलफनामे में प्रसार भारती अध्यक्ष ने यह भी कहा है कि लाली को सेवा विस्तार दिए जने से पहले उनकी राय लेने की जरूरत महसूस नहीं की गई। हलफनामे में भटनागर ने कहा है कि प्रसार भारती में भ्रष्टाचार और तमाम अनियमितताओं के आरोपों के मद्देनजर यह अत्यंत जरूरी है कि इन आरोपों की विस्तृत और समयबद्ध जंच एक स्वतंत्र एजेंसी से अविलंब कराई जए।

दूरदर्शन से जुड़ीं प्रमुख मीडिया हस्ती और खुद एक चैनल चलाने वाली नलिनी सिंह कहती हैं, ‘प्रसार भारती के विशाल इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी विशेषज्ञता का कोई सानी नहीं है। इसके सामने कोई दूसरा चैनल नहीं ठहर सकता है। दूरदर्शन के साथ मेरा अनुभव अच्छा रहा है। लेकिन निष्पक्ष तौर पर कहा जए तो वसे संगठनों को जिनका एक खास क्षेत्र में एकाधिकार रहा है, उन्हें अपनी कार्यप्रणाली को दुरुस्त बनाए रखने पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। जिन्होंने ऐसा किया उन्हें किसी तरह की प्रतिस्पर्धा से कोई खतरा नहीं। ’

 

मेरी नीयत साफ है
बी. एस. लाली, सीईओ, प्रसार भारती

यह सच है कि प्रसार भारती में कुछ खामियां हैं और ये काफी समय से हैं। इनका निदान होना चाहिए। पर यह भी सच है कि इस संस्था में असीम संभावनाएं हैं अगर इस पर तरीके से ध्यान दिया जए। प्रसार भारती के बनने के बाद से ही कई प्रावधान ऐसे हैं जिन पर कार्रवाई होनी चाहिए। प्रसार भारती के कर्मचारियों जसे कुछ मामले हैं जिन पर काम हो रहा है, लेकिन धीरे धीरे। कुछ कठिनाइयों के बाद भी पिछले दो सालों से हम प्रसार भारती को आगे की ओर ले गए हैं। लेकिन इसे और ऊपर ले जने के लिए कुछ ठोस और व्यापक कदम उठाने होंगे जो नीतिगत और वधानिक हों। जहां तक प्रसार भारती बोर्ड में चल रहे मामले की बात है तो मैं स्पष्ट कहना चाहूंगा कि मेरी नीयत बिल्कुल साफ है और इस संस्थान की भलाई के लिए है। बोर्ड के उन सदस्यों पर टिप्पणी नहीं करूंगा जिन्होंने आरोप लगाए हैं। लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि हर व्यक्ित की अपनी पहचान होती है और सिविल सेवा के इतने विशद अनुभव के बाद कुछ लोग बेवजह मेरे विरोधी बन जएं तो आश्चर्य नहीं।

 

गुणवत्ता के लिए पूरा ढांचा बदलने की जरूरत
राजीव रतन शाह, प्रसार भारती के पूर्व सीईओ

प्रसार भारती का ढांचा और कई तकनीकें पुरानी पड़ गई है। इसमें पूर्ण बदलाव की जरूरत है। दूरदर्शन का इंजीनियरिंग विभाग इसके कार्यक्रम विभाग पर हावी है। किसी भी चैनल का ड्राइवर उसका इंजीनियरिंग विभाग नहीं हो सकता।

यह असंतुलन दूर करना होगा। लेकिन सबसे जरूरी प्रसार भारती को अपने कार्यक्रमों की गुणवत्ता में भारी सुधार करना है। इसका निदान यह है कि प्रसार भारती 40 से 45,000 कर्मचारियों की अपनी फौज को कम करे। दूरदर्शन और आकाशवाणी का राजस्व तो कर्मचारियों के वेतन में ही खर्च हो जता है। किसी चैनल की ब्रांड इक्विटी उसके कार्यक्रम ही होते हैं। मैं इस धारणा से सहमत नहीं कि सामाजिक संदेशों से युक्त कार्यक्रम लोग नहीं पसंद करते। आप कलर्स का उदाहरण देखें। दूरदर्शन जो पब्लिक सर्विस मैसेज देता है, वे फूहड़ और बोरिंग होते हैं। लेकिन मेरी राय है कि काबिल लोगों की कोई कमी दूरदर्शन/आकाशवाणी में नहीं है। ज्यादातर निजी चैनल यहां के पुराने अनुभवी लोगों से चलाए ज रहे हैं। दिक्कत ये है कि यहां सरकारी तंत्र वाली मानसिकता हावी है।

 

ताकत है, पर ताकत का अहसास नहीं
पी.एस.देवधर, प्रसार भारती की एयरटाइम कमेटी के पूर्व अध्यक्ष

विशेषज्ञों की समितियां बनाना और फिर उन समितियों की सिफारिशों को कूड़ेदान में डाल देना भारत सरकार के विभिन्न विभागों की सच्चई है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि इसके लिए सिर्फ दूरदर्शन या प्रसार भारती को दोष देना ठीक है। उन्होंने भी मेरी अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के साथ ऐसा किया तो इसमें कोई नई बात नहीं।

प्रसार भारती शुरू से ही ऐसी स्थिति में था कि प्रभुता और नेतृत्व की अपनी स्थिति को बनाकर रखता। यह न केवल अपने राजस्व में लगातार बढ़ोतरी करता रहता बल्कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाता। लेकिन यह अपने घिसेपिटे कानूनों में ही उलझ रह गया। खुद के पास आने वाले नए विचारों और कॉन्सैप्ट्स पर इसने रोक लगाई और नतीज सब के सामने है। मेरी अध्यक्षता में जो समिति बनी और जिसने अंतत: दूरदर्शन के मेट्रो चैनल को जन्म दिया (डीडी 2 के नाम से लोकप्रिय मेट्रो चैनल एक समय अत्यंत लोकप्रिय चैनल था। लेकिन सरकार ने इसे बंद कर डीडी न्यूज का रूप दे दिया), ने कई सिफारिशें कीं जो व्यावहारिक थीं। लेकिन उन्हें कभी नहीं माना गया।

हमने कहा कि प्रसार भारती के पास सबसे बड़ी ताकत प्रसारण से जुड़ा इसका विशाल ढांचा है जिसमें करोड़ों-अरबों की जमीन, वहां बने विशाल टावर, ट्रांसमीटर, इसके सैकड़ों इंजीनियर शामिल हैं। अगर प्रसार भारती नए टीवी चैनलों, मोबाइल ऑपरेटरों या अन्य ऐसे जरूरतमंदों को अपना साजो-सामान किराए पर देता तो आज इसे खुद को चलाने के लिए सूचना व प्रसारण मंत्रालय के सामने हर साल भीख नहीं मांगनी पड़ती। यहां हर शहर में आपको सैकड़ों टावर देखने को मिलेंगे। आप लंदन, न्यूयार्क या किसी बड़े शहर में चले जएं, वहां एक विशाल टावर दिखेगा जिससे सभी चैनलों, मोबाइल कंपनियों के काम निकल आते हैं। प्रसार भारती तब तक नहीं सुधर सकता, जब तक नौकरशाही में अनुशासन नहीं आएगा। जब तक वे प्रसार भारती को सुधारना नहीं चाहेंगे, यह नहीं हो सकता। देश के नेतागण कमजोर हैं। वे नौकरशाहों पर निर्भर हैं, भले ही वे खुद को कितना ही ताकतवर समझते हों। प्रसार भारती की एक बड़ी कमजोरी इसका दिल्ली केंद्रित होना है। इसने शुरू से क्षेत्रीय प्रतिभाओं और उम्मीदों की अवहेलना की है।

 

मंजिल का पता नहीं, बेमानी सफर जरी है
भास्कर घोष, दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक, पूर्व सूचना व प्रसारण सचिव

मेरी राय में सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रसार भारती का उद्देश्य क्या है। क्या इससे पैसा बनाना है या फिर सूचना, शिक्षा और मनोरंजन प्रदान करने के इसके मैंडेट के हिसाब से इससे काम लेना है। सरकार को सोचना पड़ेगा कि इसे किस तरह से आगे ले जएं। मेरे हिसाब से प्रसार भारती के लक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं।

1999 में विश्व प्रसिद्ध कन्सलटिंग फर्म मैकेन्जी ने दुनिया भर के पब्लिक ब्रॉडकास्टर्स का सव्रेक्षण किया। उन्होंने इसमें दूरदर्शन को शामिल नहीं किया क्योंकि उनकी नजर में दूरदर्शन एक पब्लिक ब्रॉडकास्टर नहीं था। उन्होंने कनाडा (सीबीसी), ऑस्ट्रेलिया (एबीसी), ब्रिटेन (बीबीसी), जर्मनी (एआरडी), जपान (एनएचके) जसे कई ऐसे पब्लिक ब्रॉडकास्टरों के कामकाज का अध्ययन किया।  उनके नतीजे के हिसाब से अगर सरकारी पैसे से चैनल चलाए जएंगे तो कार्यक्रम थकाऊ और बोरिंग होंगे।  इससे बचने का एक ही तरीका है कि ऐसे चैनलों को दर्शकों से लाइसेंस फीस वसूलने के अधिकार मिलें। बीबीसी हर साल लाइसेंस फीस पर सैकड़ों करोड़ पाउंड वसूलता है। दूरदर्शन को लायसेंस फीस लेने की अनुमति मिलनी चाहिए। सरकारी पैसे से बने कार्यक्रम सच का सामना, राखी का स्वयंवर या बालिका वधू का मुकाबला नहीं कर पाएंगे।

सबसे पहले प्रसार भारती के वित्तीय उद्देश्यों को स्पष्ट करना होगा और फिर इसके प्रशासनिक ढांचे में व्यापक बदलाव लाने होंगे। अतिरिक्त स्टाफ हटाना होगा। प्रसार भारती के सभी कर्मचारी सूचना व प्रसारण मंत्रालय से डेपुटेशन पर आए हैं। इसे ठीक करना होगा। सरकार शुद्ध रूप से सरकारी चैनल रखे और इसमें नौकरी दे। लेकिन प्रसार भारती को यह अनुमति दी जए कि वह अपने बाकी चैनलों को प्रोफेशनल हाथों में दे।

प्रसार भारती एक्ट में बदलाव लाना मेरे हिसाब से एक अन्य जरूरी कदम है। एक्ट का सेक्शन 22 कहता है कि केन्द्र सरकार जब चाहे, प्रसार भारती को कोई निर्देश दे सकता है और प्रसार भारती के लिए उसे मानना बाध्यता होगी। अब बताइये कि ऐसे में प्रसारभारती स्वायत्त कैसे रह सकता है?

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