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यहां हीर-रांझ के लिए कोई वारिस शाह नहीं रोता

माना जता है कि समाज अपने आघात से सीखता है, मगर हरियाणा में आकर ऐसी मान्यताएं अक्सर खापों के कठोर फैसलों के आगे टूटती दिखती हैं। गोत्र के दायरे से बाहर जाकर विवाह और प्रेम विवाह करने वालों के खिलाफ मौत तक के फरमान बदस्तूर जारी हैं। इसके बावजूद ऐसे विवाह हो रहे हैं और फरमान भी उसी गति जारी हो रहे हैं।

शादी ही नहीं, बच्चे होने के बाद भी कई बार दंपति को खाप के फैसले पर भाई-बहन बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इस तरह के फरमान सुनने में पूरी तरह तुगलकी और तालीबानी ही लगते हैं। इसके बावजूद कोई नेता या पुलिस अधिकारी इसके खिलाफ जुबान खोलने को राजी नहीं है।

इस संबंध में खापों के अपने तर्क हैं। वह यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि इसकी वजह पचंयातों के अपने अधिकारों से आगे जाकर फैसला करना है। उनका मानना है कि कुछ नियमों में ही खोट है।  अखिल भारतीय जाट महासभा के अध्यक्ष पवनजीत सिंह का कहना है कि हिन्दू विवाह अधिनियम हमारे समाज के अनुरूप नहीं है। कानूनी तौर पर ऐसी शादियों को भी मान्यता दे दी जाती है, जो हमारे संस्कृति के अनुसार बहन-भाई माने जाते हैं।

ऐसे में टकराव तो होता रहेगा। लोग भले इन्हें तुगलकी और तालीबानी फरमान कहें मगर, हमारी जड़ों और जरूरतों को समझते हुए प्रावधान किया जाना चाहिए और हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन होना चाहिए। जब तक यह नहीं होगा, ऐसे टकराव होते ही रहेंगे।

आर्य समाज के स्वामी अग्निवेश सिंहवाला की घटना को सरकार की नाकामी के रूप में भी देखते हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई नागरिक हाईकोर्ट से आदेश लेकर भी सुरक्षित नहीं है तो इसका मतलब है कि सरकार कमजोर है। वह कानून-व्यवस्था को लागू कर पाने में नाकाम है।सरकार को सामंती ताकतों के आगे नहीं झुकना चाहिए। आर्य समाज हमेशा ही जातिवाद आधारित व्यवस्था के खिलाफ रहा है।

आर्य समाज के मंदिरों में देशभर में प्रतिदिन 700 से 800 शादियां होती हैं। साथी चुनने का अधिकार युवक-युवती को ही है, परिवार वालों को उसका समर्थन करना चाहिए। वह कहते हैं कि स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि स्वयंवर प्रथा हमारे समाज जब तक रही तब तक आर्यावर्त ऊंचाई तक गया और जब से यह खत्म हुआ, पतन शुरू हो गया।

समाज में युवा जोड़ों के प्रेम के प्रति सामंती नजरिया कई बार बदले की भावना से भी प्रेरित होता है। ऐसा लगता है कि हीर-रांझ के किस्से सुनकर यहां किसी की आंखें वारिस शाह की तरह नहीं भीगती। हरियाणवी फिल्म चंद्रावल भी दुखांत प्रेम कहानी पर ही आधारित थी , जो सुपर हिट रही। जो किस्से हमारा मनोरंजन करते हैं, वे क्या हमें सबक नहीं देते। वेदपाल जैसा हर किस्सा भी अपने पीछे सबक छोड़ जाता है, असर आएगा मगर धीरे-धीरे। 

 

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