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अधिकारों के लिए जूझती ईरानी औरतें

जून में कई सप्ताह तक ईरान खबरों में छाया रहा। अब वह पृष्ठभूमि में है। मोहम्मद अहमदीनेजद के चुनाव को चुनौती देने के लिए ईरान में जो विशाल प्रदर्शन हुआ उसका एक उल्लेखनीय पहलू उसमें बड़ी संख्या में महिलाओं का शामिल होना था। वैसे ईरान की महिलाएं विश्व परिदृश्य पर नहीं दिखती हैं। अचानक उनकी उपस्थिति दर्ज हुई।
इन प्रदर्शनों के दौरान संगीत की छात्रा नेडा की गोली लगने से मृत्यु हो गई। उसकी मौत की घटना को कैमरे में कैद कर लिया गया, जिसे पूरी दुनिया ने देखा। यह दुखद घटना आम लोगों पर किए जा रहे अत्याचार की ही नहीं, बल्कि ईरान में आ रहे बदलाव के आंदोलन का प्रतीक भी है, जिसके लिए वहां की महिलाएं दशकों से जूझ रही हैं। इस बारे में ज्यादा कुछ सामने नहीं आया है। ईरान जैसे देश पर लोग तभी ध्यान देते हैं, जब वहां कोई बड़ी घटना घटती है।
न्याय और समानता के लिए ईरान की महिलाओं का संघर्ष 1979 में हुई क्रांति, जिसमें ईरान के शाह का तख्ता पलट दिया गया था, के बाद ही शुरू हो गया था। उस आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। उन्हें उम्मीद थी कि शाह के दमनकारी शासन के बाद उन्हें समान नागरिक अधिकार मिलेंगे। लेकिन सत्ता में आए इस्लामिक रिपब्लिक ने पिछले दशकों में मिले अधिकारों को भी उनसे छीन लिया। उनके पास केवल वोट डालने का अधिकार बचा, जो उन्हें 1963 के अंत में मिला था। अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामिक सरकार ने महिलाओं से संबंधित अनेक कानून रद्द कर दिए। यह तय किया कि कोई महिला जज नहीं हो सकती। 1967 में लागू किया गया परिवार संरक्षण कानून रद्द कर दिया। लड़कियों की विवाह की न्यूनतम आयु कम करके नौ वर्ष कर दी गई (लड़कों की 14 वर्ष) और लड़कियों के लिए बुर्का पहनना अनिवार्य बना दिया गया। समुद्री तट जैसे सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं का प्रवेश वजिर्त कर दिया और उनके खेलों में भाग लेने पर पाबंदी लगा दी ।
ईरान में महिला आंदोलन के अध्ययन के लिए होमा हुदफार ने एसोसिएशन फार वूमन इन डवलपमेंट (www.awid.com) के सहयोग से एक पेपर लिखा। इससे कई तथ्य सामने आए। जैसे शाह के खिलाफ आंदोलन में बुर्का पहनकर भाग लेने वाली ज्यादातर महिलाएं मध्यम वर्ग की थीं, जिन्होंने बुर्का पहनना छोड़ दिया था। शाह के शासन का विरोध करते समय उन्होंने बुर्का पहना और माना कि इस प्रथा का अंत महिलाओं को बराबरी के अधिकार का मार्ग प्रशस्त करेगा। क्रांति के शुरुआती दिनों में बहुत सी महिलाओं ने विरोध किया। लेकिन उन्हें वामपंथ सहित सभी राजनीतिक दलों का बहुत कम समर्थन मिला। उन्हें धार्मिक कट्टरपंथियों और पुलिस के हमलों का सामना करना पड़ा।
इसके बाद ईरान-इराक युद्ध शुरू होने पर महिला विरोधी कानूनों को चुनौती देने के उनके प्रयासों का अंत हो गया। लेकिन मंथन जारी रहा। धर्मनिरपेक्ष महिलाओं का मानना था कि केवल धर्मनिरपेक्ष सरकार ही उनके अधिकारों को पुर्नस्थापित कर सकती है, जबकि संकीर्ण विचारों वाली और धार्मिक महिलाओं की सोच थी कि इस्लामिक शासन में भी इन अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता। धार्मिक महिलाओं के समूह ने महिलाओं की पत्रिकाओं में ऐसी कहानियां लिखनी शुरू की, जिनमें बताया गया कि किस तरह शादी के 20, 30 और 40 वर्ष बाद औरतों को तलाक दे दिया जता है। उन्हें कोई गुजरा भत्ता भी नहीं मिलता, क्योंकि कानून पुरुषों के पक्ष में है। इस बीच उन युवा विधवाओं के बारे में खबरें आने लगीं, जिनके पति ईरान-इराक युद्ध में मारे गए और इसके बाद उन्हें अपने बच्चों की परवरिश के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। बड़े पैमाने पर इन ज्यादतियों के बारे में
महिलाओं की पत्रिकाओं और नेताओं को पत्र लिखने का अभियान चलाया गया। महिलाओं की आवाज सुनी जा रही है, इसका पहला संकेत 1985 में तब मिला जब अयातुल्ला खुमैनी ने घोषणा की कि शहीदों की विधवाएं दुबारा विवाह करने पर भी अपने बच्चों की परवरिश कर सकती हैं। इसके बाद बने नए विवाह समझोते ने महिलाओं को तलाक का अधिकार दिया।
1989 में खुमैनी की मृत्यु और इराक से युद्ध की समाप्ति के बाद कुछ अन्य बदलाव आए। खुमैनी ने परिवार नियोजन और संगीत पर पहले ही पाबंदी हटा दी थी। महिलाओं को अब अधिक उदार धार्मिक नेताओं से बातचीत का हक मिल गया था। 1989 में उदारवादी हाशमी रफसनजनी के सत्ता में आने के बाद 1991 में घरेलू काम के लिए मजदूरी संबंधी बिल पास हुआ। पहली बार महिला मामलों का एक ब्यूरो बना। महिलाओं को खेलों में भाग लेने की अनुमति तो मिली, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की इजजत अभी भी नहीं थी। हां, उनके लिए अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम महिला खेलों का आयोजन किया गया, जिसमें वे भाग ले सकती थीं। ईरानी महिलाएं विदेश भी गई और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के महिलाओं से संबंधित अनेक सम्मेलनों में हिस्सा लिया।
1997 में एक और उदार नेता मोहम्मद खतामी के सत्ता में आने के बाद महिलाओं की उपस्थिति और उभरकर सामने आई। बड़ी संख्या में महिलाओं ने चुनावों में भाग लिया और राजनीतिक गलियारों में उनके अधिकारों की बात सुनाई पड़ने लगी।
खतामी के राष्ट्रपति काल में महिलाएं संगठित हुई। उन पर लगी अनेक पाबंदियां हटा ली गईं। इसके बावजूद जैसा वे चाहती थीं, वैसा कोई कानूनी सुधार उनके पक्ष में नहीं हुआ। सरकार से महिलाओं के मोहभंग का प्रमाण जून 2005 में तेहरान विश्वविद्यालय में संवधानिक सुधार की मांग को लेकर हुई रैली से मिला। इस रैली में 5,000 से ज्यादा महिलाओं ने भाग लिया। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा। आंदोलन से जनभावना आम हो गई। जब सरकार की तरफ से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला तो बहुत सी महिलाओं ने 2005 के आम चुनावों के बहिष्कार का फैसला किया। समझ जाता है कि कुछ हद तक संकीर्ण विचारधारा के अहमदीनेजद की जीत महिलाओं के मतदान में भाग न लेने से हुई। जब से अहमदीनेजद सत्ता में हैं, ईरान में महिलाएं बदलाव के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं। जून के महीने में तेहरान की गलियों में उनका जमावड़ा अचानक नहीं हुआ था। यह उनके लंबे संघर्ष का परिणाम है। सरकार के हिंसक हमलों तथा महिलाओं के जेल में ठूंसने के दमनकारी हथकंडों के बावजूद उनका संघर्ष जारी है। सत्तारूढ़ शासन सहित ईरान में कोई भी सरकार अब इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि विभिन्न वर्गो और आयु की लाखों महिलाएं न्याय व समान अधिकार के लिए कमर कस चुकी हैं।
kalpu.sharma@gmail.com
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार है

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