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केरल: माकपा की समस्या और उलझी

माकपा को एक अच्छा मौका मिला था और वह चाहती तो वह केरल में अपने संगठन को ठीक ठिकाने करसकती थी, लेकिन कुछ दिखावटी काम करके पार्टी ने यह मौका हाथ से निकल जाने दिया। मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन को पार्टी पोलित ब्यूरो से निकालना पार्टी के सामने राज्य में पेश चुनौतियों के लिहाज से पर्याप्त नहीं है।

मुख्यमंत्री और पार्टी की राज्य इकाई के नेता पिन्नारी विजयन के बीच मतभेदों से माकपा को मौका मिला था कि वह राज्य इकाई को एक नई राजनीति संस्कृति दे सकती थी, जिससे केरल के बदलते सामाजिक राजनीतिक हालाता का ज्यादा अच्छे ढंग से सामना किया जा सकता। लेकिन पार्टी ने इस झगड़े को करोड़ों रुपये की लवेलिन परियोजना पर दो व्यक्तियों के टकराव से आगे बढ़कर देखने की कोशिश नहीं की। और उसके बाद जो फैसला हुआ वह कुछ बड़ा हासिल होने की उम्मीद नहीं बंधाता।

केरल में अनुशासन की इस कार्रवाई का महत्व समझने के लिए जो तीन क्षेत्रीय सम्मेलन हुए उनसे भी ऐसी ही फुसफुसाहटें सुनाईं दीं। और जब पार्टी के महासचिव प्रकाश करात सेंट्रल कमेटी के इस फैसले को राज्य के नेताओं को बता रहे थे तो उसी समय संदेह व्यक्त किए गए थे कि इस फैसले से राज्य इकाई की गुटबाजी पर कोई असर पड़ेगा। करात ने पार्टी के हित में सरकार और पार्टी के बीच बाधाहीन समन्वय के पार्टी के राज्य सचिवालय की विशेष बैठक की तो राज्य के नेताओं को पता था कि करात पर ऐसी पाबंदियों का असर नहींपड़ने वाला।

तीनों क्षेत्रीय सम्मेलनों में अच्युतानंदन के समर्थकों को शांत करने के लिए करात यह कहना कहीं नहीं भूलते थे कि पार्टी के पहले वरिष्ठ नेता नहीं हैं, जिनके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की गई है। इस फेहरिस्त में वरिष्ठ कांग्रेस नेता ईएमएस नंबूदिरीपाद और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती भी रह चुके हैं। लेकिन पार्टी के नेताइतने भर से संतुष्ट नहीं हुए, उनका कहना था कि पहले के मामलों में समस्या पार्टी अनुशासन के उल्लंघन की थी, लेकिन इस मामले में समस्या भ्रष्टाचार को लेकर है। उनका सवाल था कि पार्टी मंच पर भ्रष्टाचार का मसला उठाने की सजा अच्युतानंदन को क्यों मिल रही है। केंद्रीय नेतृत्व का स्टैंड यह है कि लेवलिन के मामले को राजनैतिक मकसद से उठाया गया है, इसलिए इसका मुकाबला राजनैतिक और कानूनी स्तर पर ही करना चाहिए। लेकिन पार्टी के कई नेता इससे संतुष्ट नहीं हैं। वे मानते हैं कि पार्टी ने इसे राजनैतिक कहकर इस बात से चुप्पी साध ली है कि मामले की जांच में अगर पिन्नारी विजयन दोषी पाए गए तो क्या होगा?
कुछ भी हो सेंट्रल कमेटी के फैसले में माकपा की केरल इकाई के संकट का हल नहीं है। केंद्रीय नेताओं ने व्यक्तिवादी राजनीति के आरोप में अच्युतानंदन के खिलाफ तो कार्रवाई कर दी, लेकिन पिन्नारी के खिलाफकोई कदम नहीं उठाया। माकपा की सेंट्रल कमेटी के सामने मुख्य मसला अच्युतानंदन की साफ-सुथरी छवि वाली लोकप्रिय राजनीति और विजयन की पार्टी संगठन पर मजबूत पकड़ में से एक को चुनने का था।
आम धारणा यह है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ अनुशासन की यह कार्रवाई इसलिए की गई, क्योंकि उन पर लगातार पार्टी पद से इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा था और उन्होंने इससे इनकार कर दिया। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सेंट्रल कमेटी के इस फैसले से अच्युतानंदन अपना रास्ता बदल देंगे, इसकी जरा भीसंभावना नहीं है।
86 साल के इस उम्रदराज नेता को यह अच्छी तरह पता है कि माकपा में आगे बढ़ने के लिए पार्टी का समर्थन चाहिए होता है। और नेता जब अकेला पड़ जाता है तो कुछ ही समय में मीडिया का प्रचार और जनता का समर्थन सुस्त पड़ने लगता है। साथ ही वे अपनी छवि एक ऐसे नेता की भी नहीं बनाना चाहते, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ अड़कर खड़ा हो। उन्हें यह भी अहसास हो गया है कि वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के अन्य घटक जो अभी तक इस मसले पर उनके साथ थे और लगातार उनका समर्थन कर रहे थे, वे माकपा सेंट्रल कमेटी का फैसला आते ही चुप्पी साध चुके हैं। उन्हें यह भी पता है कि भले ही उनकी छवि साफ-सुथरी बन गई हो और भले ही जनता उन्हें पसंद करती हो, लेकिन पार्टी जल्द ही उन्हें ताक पर रख देगी।
सच यही है कि सारी नजरें अब अच्युतानंदन पर हैं और कोई भी जरा सी चूक उन्हें ले बैठेगी। लेकिन ऐसा नहीं है कि अच्युतनंदन भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई
छोड़ देंगे। उन्हें पार्टी में रहना है, और वे अपने पद को बरकरार रखने के साथ वे अपनी जंग जरी रखना चाहेंगे। यह आसान नहीं है क्योंकि पार्टी के ज्यादातर नेता विरोधी खेमे में हैं।

radhaviswanath73@yahoo.com
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं  

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