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जैसी सोच, वैसे हम

जीवन में बहुत सी स्थितियों का संबंध हमारे मित्र, परिवारजनों या अपने सहकर्मी- कैसा व्यवहार करता हैं, इस पर निर्भर करता है। हम दूसरों के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखते हैं, वह भी कुछ हद तक हमारे अन्दर की सोच का नतीजा है। आमतौर पर हम दूसरों को हर बात के लिए दोषी ठहराते हैं। दरअसल, जो कुछ भी हम देखते हैं, सुनते हैं, अनुभव करते हैं, सूंघते हैं, वह सब हमारे अन्दर का ही प्रतिबिम्ब है। जैसा व्यक्ति सोचता है, वैसा ही बन जाता है।
यदि हमें अपने जीवन की धाराप्रवाह को ठीक रास्ते पर ले जाना है तो हमें अपने अन्दर झांकना होगा। हमारे अन्दर का विश्वासरूपी तापमान ही हमें संचालित करता है कि हमें क्या प्राप्त करना है। हम जो भी हैं, अपने विचारों की ही उपज हैं। केवल मनुष्य ही ज्ञान, विज्ञान को पूरी तरह पाने का सामर्थ्य रखता है। जब हम अपने आप में दृढ़ विश्वास रखते हैं, तो अच्छे परिणाम सामने आने शुरू हो जाते हैं।
हमारे विचार, हमारी सोच हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। अगर यह नकारात्मक है, तो हमें असंतोष की ओर ले जाते हैं। हमारे अपने अन्दर के भाव जैसे होंगे, उसके अनुरूप वे हमारे इर्द-गिर्द वातावरण बना लेते हैं। जिस मनुष्य के जीवन में साधना, आत्मसंयम, सादगी और संतोष का पुट होता है, वह सात्विक मार्ग पर दृढ़ रहता है तथा प्रत्येक परिस्थिति में शांत और संतुलित रहता है। आंतरिक प्रकाश ही उसका प्रेरणा-स्रोत होता है तथा आंतरिक जीवन ही उसका सच्चा धन होता है। जब हमारा मन, शान्त, संतुलित, स्वस्थ, सकारात्मक है तो हम जहाँ भी जाएंगे, प्रसन्नता और शान्ति बिखेरेंगे। किसी ने ठीक कहा है-
सोच में संशय है तो असफल होंगे ।
सोच में जीत की भावना है तो सफल होंगे ।

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