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निर्माण की बाधा

हमारे बजट, हमारी योजनाओं का सारा जोर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर है। विकास के लिए अभी बहुत कुछ करना है, ढेर सारी सड़कें, बहुत से पुल, एयरपोर्ट, बंदरगाह वगैरह कई तरह के निर्माण होने हैं। अभी तक हम यह मानते रहे हैं कि सिर्फ वित्तीय संसाधन जुटाकर हम इस काम को अंजम दे सकते हैं। लेकिन मेट्रो मैन श्रीधरन का कहना है कि इतना भर ही काफी नहीं है। देश में न तो पर्याप्त संख्या में ऐसे पेशेवर ठेकेदार हैं, जो आधुनिक किस्म के इन्फ्रास्ट्रक्चर को पूरा करने का सामर्थ्य और अनुभव रखते हों और न ही इन परियोजनाओं को सिरे चढ़ाने के लिए कुशल कामगार हैं। काम और काम में इस्तेमाल होने वाले भारी भरकम औजारों की सर्टीफिकेशन की कोई भरोसमंद व्यवस्था भी अभी तक हमारे पास नहीं है। दरअसल हमारी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं अभी भी सदियों पुरानी उस धारणा पर चलती हैं, जिसमें ज्यादातर काम सस्ते अकुशल मजदूरों से कराया जाता है, और इसका जिम्मा ऐसे जुगाड़ी किस्म के ठेकेदार के हवाले कर दिया जाता है जो सबका ‘ख्याल’ रखते हुए परियोजना के काम को किसी तरह निपटा दे।

इसके चलते नए जमाने की प्रतिस्पर्धी चुस्त व्यवसायिकता इस कारोबार में आई ही नहीं है। रेल की पटरियां बिछाने के युग में हमने जो व्यवस्था तैयार की थी उसके साथ ही हम आधुनिक एयरपोर्ट के युग में जाने की असंभव कोशिश कर रहे हैं। नतीजा जमरूदपुर में दिखा। हमें जिस दूरगामी सोच की जरूरत है वह अक्सर हमारी योजनाओं में नजर नहीं आती। परियोजनाएं शुरू तो भविष्य की जरूरत के नाम पर होती हैं लेकिन जब वह पूरी होती हैं तो तब तक बढ़ चुकी जरूरत के आगे वे बहुत छोटी हो चुकी होती हैं। साथ ही यह सोच कहीं नहीं दिखती कि भविष्य में हमें कितने और किस तरह के कुशल कामगार चाहिए होंगे। उनके प्रशिक्षण के लिए हमें अभी से ही कैसी व्यवस्थाएं हो जानी चाहिए। यह उस समाज की बात है जहां बेरोजगारी अभी भी बहुत बड़ी समस्या है, लेकिन काम के लिए कुशल लोग नहीं हैं। फिलवक्त कुशल निर्माण कंपनियों की कमी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को आमंत्रित करके पूरी की जा सकती है जिनके पास ऐसी परियोजनाओं का पर्याप्त अनुभव हो। इससे स्पर्धा बढ़ेगी तो घरेलू कंपनियां भी झख मारकर ही सही अधिक आधुनिक और अधिक दक्ष बनने को बाध्य होंगी। भले ही शुरू में इसका राजनैतिक विरोध हो लेकिन इसकी जरूरत है।

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