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एक ही प्रकरण की अलग-अलग जांच और नतीजे भी अलग

बाराबंकी के डीएम के रवींद्र नायक ने स्वास्थ्य महानिदेशक को कई बार पत्र लिखा कि जिला महिला अस्पताल की मुख्य अधीक्षिका डॉ. सविता भट्ट का निलम्बन रद्द कर उन्हें पुन: जिले में तैनाती दी जाए। पर विभाग ने ऐसा नहीं किया। इसके विपरीत सीतापुर में हुए एक प्रकरण में जिला प्रशासन की रिपोर्ट को ढाल बनाकर दो डॉक्टरों को निलम्बित कर दिया गया। स्वास्थ्य विभाग में इसमें ऐसी जल्दीबाजी बरती कि संविदा डॉक्टर को ही निलम्बित कर दिया। अब यह प्रकरण मुख्यमंत्री के यहाँ शिकायती पत्र के जरिए भेजे गए हैं।

स्वास्थ्य विभाग में इस समय ऐसे मामलों का ढेर लगता जा रहा है जिसमें एक ही प्रकरण की जांच दो एजेंसियों ने की हो और दोनों की रिपोर्ट विरोधाभासी हो। आमतौर पर मरीजों के साथ होने वाली लापरवाहियों की जांच प्रशासन कराता है। जिलों में जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग अलग-अलग जांच कराने लगे हैं। अधिकतर जांच रिपोर्ट में एकरूपता न होने से सवाल उठता है कि स्वास्थ्य विभाग किसे सही मानकर कार्रवाई करे? यही मुद्दा विवाद की वजह बना है। दरअसल किसी भी डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार शासन को है।

स्वास्थ्य महानिदेशक शासन को कार्रवाई की संस्तुति करते हैं। लेकिन किसी मामले में महानिदेशालय डीएम की रिपोर्ट को सही मानकर कार्रवाई की संस्तुति करता है तो किसी में अपने अधिकारियों की रिपोर्ट को तरजीह दी जा रही है। दो मामलों से इसकी नजीर समझी जा सकती है। पहला प्रकरण बाराबंकी का है यहाँ महिला जिला अस्पताल के गेट पर 31 मई को एक गर्भवती महिला किरन की मौत हो गई। जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों की संयुक्त जांच में पाया गया कि महिला को पीएचसी में प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति में जिला अस्पताल भेज गया।

अस्पताल आने के पूर्व रास्ते में दो रेलवे क्रासिंग थीं जो दोनों बंद थी। महिला को परिजन उस गेट से अस्पताल ले गए जो हमेशा बंद रहता है। मौके पर मौजूद गार्ड जब तक चाभी लाकर गेट खोलता महिला की मौत हो गई। इस मामले में स्वास्थ्य महानिदेशक की रिपोर्ट पर शासन ने सीएमएस को उसी दिन निलम्बित कर दिया। पर डीएम ने जांच की तो सीएमएस की कोई गलती नहीं पाई गई। 24 जून को डीएम ने अपनी रिपोर्ट स्वास्थ्य महानिदेशालय भेजी पर सीएमएस अभी तक निलम्बित हैं।

दूसरा प्रकरण सीतापुर का है यहाँ 16 अप्रैल को जिला महिला अस्पताल के बाहर सड़क पर जमुना देवी नाम की एक मरीज ने बच्च जना। जिला प्रशासन ने इस प्रकरण की जांच के बाद डच्यूटी पर मौजूद डॉ. निशा पाण्डेय और संविदा की डॉक्टर दिव्या को निलम्बित करने की संस्तुति की। लेकिन जब स्वास्थ्य विभाग ने जांच की तो पाया गया कि जिस दिन महिला का सड़क पर प्रसव हुआ उस दिन अस्पताल में कई डिलेवरी हुईं थीं और दोनों डॉक्टर लगातार ओटी में रही थीं।

लेकिन शासन ने यहाँ विभागीय रिपोर्ट की बजाय जिला प्रशासन की रिपोर्ट को तरजीह दे दी। शासन ने यहाँ निलम्बन में भी ऐसी जल्दीबाजी दिखाई कि संविदा डॉक्टर को ही निलम्बित करने और आधे वेतन की कटौती का आदेश कर दिया। जबकि संविदा डॉक्टर की सेवाएँ समाप्त हो सकती हैं निलम्बन नहीं हो सकता। इस मामले को लेकर डॉक्टर्स एसोसिएशन ने अब मुख्यमंत्री के यहाँ शिकायत भी कर दी है।

इसमें कहा गया है कि अधिकतर मामलों में महानिदेशालय की संस्तुति के आधार पर ही तत्काल निलम्बन हो जाता है और जांच रिपोर्ट को भी नहीं परखा जाता। वहीं महानिदेशक ने इस प्रकरण पर शासन की बात कहते हुए कुछ कहने से इनकार किया है।

 

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