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कानून कर रहा है कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव

 इंडियन रेलवे एक्ट की धारा 56(ए ) और ( 2) कहती है कि अगर किसी व्यक्ति को कुष्ठ रोग हुआ है तो वह रेल यात्रा नहीं कर सकता,मोटर व्हीकल एक्ट 1939 के मुताबिक अगर कोई कुष्ठ रोगी पीड़ित रहा है तो उसे ड्राइविंग लाइसेंस नहीं दिया जा सकता, अलग-अलग धर्मो से जुड़े मैरिज एक्ट में भी यह व्यवस्था है कि पति या पत्नी में से किसी को भी यह रोग हुआ है तो फिर यह दूसरे पक्ष को तलाक देने का पर्याप्त आधार है। कुछ राज्यों में रोगियों को पंचायत चुनाव लड़ने की इजजत भी नहीं है।

मेडिकल साइंस ने भले ही बैक्टीरिया जनित इस बीमारी को 95 फीसदी तक ठीक करने का इलाज खोज लिया है पर देश का कानून अभी भी अंग्रेजों के जमाने की सोच से चल रहा है। द लेप्रोसी मिशन ट्रस्ट ऑफ इंडिया से मिले आँकड़ों के मुताबिक वर्ष 1980-81 में दस हजार में से 57 लोग कुष्ठ रोग से पीड़ित होते थे। यह आँकड़ा वर्ष 2005 में घटकर प्रति दस हजार लोगों पर एक मरीज तक पहुँच गया है।

यह जानकारियाँ 22 जुलाई को नई दिल्ली में मिशन की ओर से आयोजिक एक वर्कशॉप में दी गईं। यह वर्कशॉप यूपी और छत्तीसगढ़ में कुष्ठ जगरूकता के लिए शुरू किए जाने वाले एक बड़े अभियान के संदर्भ में थी। मिशन के उपनिदेशक रंजीत मुखर्जी के मुताबिक विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के हिसाब से अब रोग पूरी तरह से नियंत्रित हो चुका है। फिलवक्त कुल 1.34 लाख नए मरीज ही पूरे देश में हैं। बाकी पुराने मरीजों को इलाज से ठीक किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि रोग पर तो काबू पा लिया गया है पर पीड़ितों के प्रति समाज के रवये और कानूनी भेदभाव को अब तक दूर नहीं किया जा सका है। उड़ीसा से आए अरुण ने बताया कि समाज में अभी भी कोढ़ी शब्द को एक गाली की तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है। हकीकत यह है कि इस रोग का सम्बन्ध किसी पूर्व जन्म या इस जन्म के पास से नहीं बल्कि बैक्टीरिया से है पर इसके पीड़ितों को हेय दृष्टि से अब तक देखा ज रहा है।

इसमें सबसे बड़ी भूमिका देश के कानूनों की भी है। निदेशक जयंत कुमार डेनियल ने बताया कि इस कानूनों को खत्म करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। यूपी और छत्तीसगढ़ में इस वास्ते एक बड़ा अभियान चलाया जाएगा। इसमें पीड़ितों के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों, मीडिया और बुद्धिजीवियों को जोड़ने की योजना है।

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